पिछला भाग पढ़े:- शिमला में ट्रुथ डेयर खेल, दोनों बहनें चुदी रेलम पेल-3
आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा, कि कैसे सपना ने अपने और राजू के बीच सेक्स रिलेशन को बताने की बात करती है, और ये बात काव्या को करंट सी लगती है। आगे की कहानी सुनिए-
सपना के मुंह से यह सवाल निकलते ही कमरे में जैसे एक पल के लिए बिजली कौंध गई। काव्या की आँखें फटी की फटी रह गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी अपनी सगी जैसी बड़ी बहन सपना, अपने सगे चचेरे भाई से ऐसा सवाल पूछ रही थी। सवाल में छिपा इशारा इतना साफ और गहरा था कि काव्या का दिमाग सुन्न हो गया। वह कभी मेरी तरफ तो कभी सपना की तरफ देखने लगी।
“दी… भैया… तुम लोग यह क्या बात कर रहे हो? तुम्हारे बीच…?” काव्या की आवाज में हैरानी और एक अजीब सी घबराहट साफ महसूस हो रही थी।
राहुल सोफे पर मजे लेते हुए पीछे टिक गया। उसकी नज़रें अब काव्या के चेहरे पर थी, जो इस अचानक खुले राज को सुन कर पूरी तरह हैरान-परेशान खड़ी थी।
शिमला की उस ठंडी रात में, अब इस सुइट के भीतर रिश्तों की मर्यादा की सारी परतें एक-एक करके उधड़ने लगी थी, और खेल अब उस मोड़ पर पहुँच चुका था जहाँ से वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं था।
कमरे के भीतर जैसे ही सपना ने वह सवाल दागा, हीटर की लाल रोशनी में सब कुछ ठहर सा गया था। मैंने राहुल की तरफ देखा, जिसके चेहरे पर एक शातिर और मजे लेती हुई मुस्कान थी। अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था, और सच कहें तो इस बर्फीली रात के माहौल में मर्यादा की हर दीवार को ढहाने का अपना ही एक अलग नशा था।
मैंने एक गहरी सांस ली, सोफे पर थोड़ा और आराम से फैलते हुए बैठ गया और सीधे काव्या की आँखों में देखते हुए बोलना शुरू किया-
“जब बात पुराने कांडों की निकली ही है काव्या, तो फिर आधा-अधूरा सच क्या बताना। आज पूरा इतिहास ही खोल देते हैं।”
मैंने बिना किसी झिझक के, बेहद बेबाक लहजे में अपनी और सपना की दास्तान सुनानी शुरू की। काव्या और राहुल सांस रोक कर सुन रहे थे।
मैंने बताया कि कैसे जयपुर के ट्रिप के दौरान, होटल के एक बंद कमरे में पहली बार हमारे बीच की भाई-बहन वाली झिझक टूटी थी। कैसे कूपे के उस सफर की नजदीकियां जयपुर पहुँचते-पहुँचते एक गहरी जिस्मानी कशिश में बदल गई थी।
मैंने मेरठ और गाँव के उन गन्ने के खेतों का भी जिक्र किया, जहाँ चिलचिलाती धूप और सन्नाटे के बीच हम दोनों ने समाज और लोक-लाज की सारी बंदिशों को पैरों तले रौंद दिया था। कैसे खेतों की उस मिट्टी के बीच सपना ने खुद को पूरी तरह मुझे सौंप दिया था।
जब घर पर कोई नहीं होता था, तो कैसे बंद कमरों के भीतर हम दोनों भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के पीछे वासना का एक ऐसा खूनी खेल खेलते थे, जिसकी भनक मम्मी-पापा को कभी नहीं लगी।
सपना मेरी इस बेबाकी को सुन कर अपनी नजरें झुकाए मुस्कुरा रही थी, और राहुल का लंड उसकी पैंट के भीतर अब पूरी तरह से अंगारा बन चुका था। लेकिन कमरे में सबसे बुरा हाल काव्या का था।
काव्या का चेहरा पूरी तरह से सफेद पड़ चुका था, उसकी सांसें तेज चल रही थी और वह फटी-फटी आँखों से मुझे देख रही थी। राहुल और सपना को लग रहा था कि काव्या हमारी इस बात को सुन कर हैरान थी क्योंकि वह हमें बहुत सीधा समझती थी। लेकिन… काव्या की हैरानी की असली वजह कुछ और ही थी।
असल में, काव्या इस बात से दंग थी कि जिस भाई को वह सिर्फ सपना का ही दीवाना समझ रही थी, वह इतनी गहराई से इस खेल में डूबा हुआ था। और सबसे बड़ा सच तो यह था कि काव्या खुद भी चंडीगढ़ जाने से पहले मेरे साथ इस जिस्मानी खेल का मजा ले चुकी थी। एक वक्त था जब मैंने उसके इस गदराए बदन को अपने बिस्तर पर पूरी तरह से नापा था। लेकिन मैंने इस पूरे खेल के दौरान एक बार भी उस बात का जिक्र नहीं किया था, जैसे मेरे और उसके बीच कभी कुछ हुआ ही ना हो।
काव्या अंदर ही अंदर कांप रही थी। उसके दिमाग में एक साथ कई सवाल कौंध रहे थे—”भैया ने सपना दी के साथ के सारे कांड बता दिए, लेकिन मेरे साथ जो कुछ किया, उसका एक लफ्ज़ भी नहीं बोला? क्या भैया यह सब जान-बूझ कर कर रहे हैं?”
राहुल ने जब काव्या के चेहरे की उस घबराहट, उसकी तेज चलती सांसों और उसके बूब्स के उभार को स्वेटर के पार इस तरह तेजी से ऊपर-नीचे होते देखा, तो वह समझ गया कि लोहा पूरी तरह गर्म हो चुका था।
राहुल अपनी जगह से उठा, वह धीरे से चल कर काव्या के सोफे के पास आया और उसके ठीक बगल में बैठ गया। उसने अपना मजबूत हाथ बहुत ही सहजता से काव्या के कंधे पर रखा, जो ठंड और घबराहट से थिरक रही थी।
“क्यों काव्या जी? उड़ गए ना होश?” राहुल ने अपनी भारी और कामुक आवाज में काव्या के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा। “तुम्हारे भैया और दी जितने सीधे दिखते हैं, बंद कमरों में उतने ही बड़े खिलाड़ी हैं। और यकीन मानो… इस शिमला की रात में, इस खेल के खिलाड़ी सिर्फ ये दोनों नहीं रहने वाले।”
काव्या ने चौंक कर राहुल की तरफ देखा। राहुल की आँखों में साफ-साफ वही हवस और लालच था जो सुबह से सुलग रहा था। लेकिन काव्या ने राहुल का हाथ अपने कंधे से हटाया नहीं। उसके अपने बदन के भीतर भी, मेरे पुराने कांडों को सुन कर और अपने उस पुराने अनुभव को याद करके, एक अजीब सी सिहरन और पानी की बूंदें रिसने लगी थी। खेल अब पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो चुका था।
राहुल ने सपना की तरफ देखते हुए अपनी बात को एक नया मोड़ दिया। उसकी आवाज में अब वही बेबाकी थी जो इस कमरे के माहौल पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
“सपना, अनजान लड़की वाली बात तो पुरानी थी,” राहुल ने अपनी शर्ट की आस्तीन को थोड़ा और ऊपर चढ़ाते हुए कहा, “लेकिन असली रोमांच तो तब शुरू हुआ जब मेरठ आते वक्त ट्रेन के उस कूपे में हम दोनों अकेले थे। सच कहूँ तो उस बंद कूपे की धुंधली रोशनी और ट्रेन की वो सधी हुई रफ्तार… उस माहौल ने हमारी सारी झिझक को एक झटके में खत्म कर दिया था।”
राहुल ने सीधे काव्या और मेरी तरफ देखते हुए उस रात का पूरा मंज़र खोलना शुरू किया।
“जब बाहर घाघ अंधेरा था और कूपे का दरवाजा अंदर से बंद था, तब पहली बार सपना ने अपनी वो सारी मर्यादा पीछे छोड़ दी थी जो वह घर पर दिखाती है। ट्रेन के उस संकरे बर्थ पर, जब हर झटका हमारे जिस्मों को एक-दूसरे के और करीब ला रहा था, तब सपना के बदन की जो गर्माहट मैंने महसूस की, वह अद्भुत थी। उसकी वो दबी हुई आहें और ट्रेन की खड़खड़ाहट के बीच हमारी वो लुका-छिपी… वह सिर्फ एक शुरुआत थी। उस रात ट्रेन के कूपे में हमने जो खेल खेला, उसने हम दोनों के बीच के सारे फासले हमेशा के लिए मिटा दिए।”
सपना ने यह सुना तो उसका चेहरा पूरी तरह लाल हो गया, लेकिन उसने राहुल को टोका नहीं, बल्कि उसकी आँखों में देखते हुए उस पुरानी याद के अहसास में खो गई।
राहुल के मुंह से ट्रेन के कूपे की इस दास्तान को सुन कर काव्या का दिल और तेजी से धड़कने लगा। वह समझ रही थी कि इस कमरे में कोई भी उतना सीधा नहीं है जितना वो ऊपर से दिखता है। उसकी नजरें बार-बार मेरी तरफ जा रही थी, क्योंकि वह अच्छी तरह जानती थी कि मेरे साथ भी उसका एक ऐसा ही गहरा और गुप्त रिश्ता रह चुका था, जिसका जिक्र मैंने अभी तक इस महफिल में नहीं किया था।
राहुल ने अपनी बात खत्म की और बहुत ही शातिर तरीके से काव्या की तरफ झुका, “क्यों काव्या जी, इस सफर की कहानियां कुछ ज्यादा ही दिलचस्प नहीं होती जा रही हैं?”
कमरे के भीतर हीटर की आंच अब और तेज लग रही थी, और ट्रेन से लेकर खेतों तक के सारे राज अब टेबल पर आ चुके थे।
राहुल ने जब अपनी और सपना की ट्रेन वाली बात खत्म की, तो कमरे के भीतर का तापमान जैसे कई डिग्री और बढ़ गया था। सन्नाटे में सिर्फ हीटर की सरसराहट और खिड़की पर टकराती बर्फ की आवाज आ रही थी।
मैंने बोतल उठाई और उसे फर्श पर एक बार फिर घुमा दिया। इस बार बोतल की किस्मत का फैसला बिल्कुल साफ था—कांच की बोतल का मुंह सीधे काव्या के सामने जाकर रुका, और पूछने वाला कोई और नहीं, बल्कि राहुल था।
राहुल के चेहरे पर एक शिकारी जैसी मुस्कान थी। उसने सीधे काव्या की झुकी हुई नजरों को अपनी तरफ खींचा और बेहद तीखे और सीधे लहजे में पूछा:
“हाँ तो काव्या जी, अब आप पूरी तरह घिर चुकी हैं। आपके भैया और आपकी दी के सारे कांड, चाहे वो ट्रेन के हों, जयपुर के हों या खेतों के, सब सामने आ चुके हैं। आप खुद को बहुत आजाद और बिंदास कहती हैं, तो आज इस सच की अदालत में बताइए… क्या आपने कभी जिंदगी में किसी के साथ ऐसा कोई गहरा, छुपा हुआ ‘कांड’ किया है? या आपका यह बिंदासपन सिर्फ बातों तक ही सीमित है?”
काव्या ने एक गहरी सांस ली। उसका गोरा चेहरा हीटर की लाल रोशनी में पूरी तरह तमाशा बन चुका था। उसने एक नज़र राहुल पर डाली, फिर सपना पर, और आखिरकार उसकी नज़रें मुझ पर आकर टिक गई। वह समझ चुकी थी कि जब इस कमरे में मर्यादा की कोई दीवार बची ही नहीं है, तो वह खुद को क्यों पीछे रखे।
उसने अपने होंठों को दांतों तले दबाया और सीधे राहुल की आँखों में देखते हुए कहा-
“राहुल जी, आपको क्या लगता है कि इस खेल के सारे खिलाड़ी सिर्फ आप और दी हैं? अगर भैया और दी ने इतिहास रचा है, तो मैं भी पीछे नहीं हूँ। और मेरा वो कांड किसी अनजान के साथ नहीं, बल्कि इसी कमरे में बैठे शख्स के साथ हुआ है।”
यह सुनते ही सपना और राहुल दोनों चौंक गए। काव्या ने मेरी तरफ इशारा करते हुए बोलना शुरू किया-
“चंडीगढ़ जाने से पहले, जब मैं यहाँ घर पर थी… एक दोपहर जब पूरा घर खाली था, तब भैया ने मुझे अपने कमरे में बुलाया था। उस दिन हमारे बीच भाई-बहन की वो सारी हिचक हमेशा के लिए टूट गई थी। भैया ने मुझे पहली बार बिस्तर पर लिटाया था और मेरे इस पूरे बदन को अपनी बाहों में ऐसा समेटा था कि मैं सब कुछ भूल गई थी। वो मेरी जिंदगी का पहला और सबसे गहरा अनुभव था, जिसे भैया ने आज तक सबसे छुपाकर रखा और इस खेल में भी नाम नहीं लिया!”
काव्या के मुंह से यह सच सुनते ही सपना की आँखें फटी की फटी रह गई, और राहुल तो जैसे खुशी के मारे उछल पड़ा। अब कमरे का पूरा नक्शा साफ हो चुका था—मैं सपना के साथ भी खेल चुका था और काव्या के साथ भी, जबकि राहुल और सपना का अपना अलग ही रोमांच चल रहा था। कोई भी यहाँ दूध का धुला नहीं था।
जब सबके सारे गुप्त राज और कांड पूरी तरह सामने आ गए, तो कमरे से बची-कुची झिझक, शर्म और सामाजिक लोक-लाज का डर पूरी तरह कपूर की तरह उड़ गया।
अब चारों के बीच एक अजीब सी, बेहद गहरी और रोमांटिक कशिश पैदा हो चुकी थी।
राहुल ने काव्या के कंधे पर दोबारा हाथ रखा, और इस बार काव्या ने ना सिर्फ उसका हाथ रहने दिया, बल्कि थोड़ा और राहुल के करीब खिसक गई। दूसरी तरफ, सपना ने सोफे पर मेरे पास आते हुए अपना हाथ मेरे घुटने पर रख दिया।
कमरे का माहौल अब पूरी तरह से कामुक, बेबाक और रोमांटिक हो चुका था। हीटर की आंच में चारों के चेहरे चमक रहे थे, और शिमला की उस बर्फीली रात में अब इस सुइट के भीतर वासना और प्यार का एक ऐसा दौर शुरू होने वाला था, जहाँ कोई नियम नहीं थे। आखिर क्या होगा जानने के लिए बने रहें अपने भाई राजू के साथ, धन्यवाद !
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