पिछला भाग पढ़े:- छोटी बहन सपना की बम्पर चुदाई अलग-अलग लंड से-6
आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा कि कैसे राहुल सपना को मुझसे चुदता हुआ देख पागल सा होने लगता है। आगे की कहानी जारी है-
उस रात मोबाइल की छोटी सी स्क्रीन के आर-पार कामुकता का एक ऐसा सैलाब उमड़ा, जिसने दिल्ली और गाँव की दूरी को पूरी तरह मिटा दिया था। राहुल दिल्ली के अपने फ्लैट में अंधकार के बीच सिर्फ फोन की नीली रोशनी में डूबा हुआ था, और उसकी आँखों के सामने सपना का वह गदराया, 32-30-32 का कातिलाना बदन पूरी तरह से नंगा था।
मैंने सपना को बेड के बिल्कुल किनारे पर, घुटनों के बल लाकर घोड़ी बना दिया था। उसका पूरा चेहरा कैमरे के बेहद करीब था, जबकि उसकी भारी, कद्दू जैसी गांड और गुलाबी चूत का मुहाना सीधे राहुल की स्क्रीन पर लाइव फ्लैश हो रहा था।
मैंने अपने 8 इंच के कड़े लंड को जब सपना की चूत के पानी से तर मुहाने पर रगड़ा, तो राहुल ने फोन के उस पार से जोर से थूक निगला। उसका लंड इस कदर अकड़ चुका था कि उसकी नसें साफ उभर आई थीं।
“देखो राहुल, मेरठ के बाद अब इस चूत की असली गहराई देखो,” मैंने कहा और अपनी पूरी ताकत से एक ऐसा अंधाधुंध धक्का मारा कि ‘पकाक-फच’ की एक बेहद रसीली आवाज सीधे राहुल के फोन के स्पीकर से गूंज उठी।
“उई मां! आहहह भैया… धीरे… उफ्फ!” सपना ने सीधे कैमरे की तरफ देखते हुए अपनी जीभ दांतों के बीच दबा ली। उसकी आँखें पूरी तरह चढ़ चुकी थी और उसके चेहरे पर असीम सुख का दर्द साफ झलक रहा था।
राहुल यह नजारा देख कर पूरी तरह से पागल होने लगा। वह बिस्तर पर छटपटाते हुए अपने लंड को पागलों की तरह सहला रहा था और फोन में लगभग रोते हुए चिल्लाया, “ओह गॉड! भैया, प्लीज… धीरे करो… धीरे करो मेरी बेबी के साथ! उसका बदन बहुत नाजुक है… आप तो उसे जान से मार दोगे!”
लेकिन मेरे ऊपर उस वक्त वासना का भूत सवार था। मैंने सपना की पतली कमर को अपनी मजबूत उंगलियों से जकड़ लिया, जिससे मेरी उंगलियों के निशान उसकी गोरी चमड़ी पर उभर आए। मैंने अपनी रफ्तार दोगुनी कर दी। ‘फच-फच-फच’, ‘चट-चट-चट’ की आवाजें उस छोटे से कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। हर धक्के के साथ सपना के बिना ब्रा के 32 इंच के पपीते जैसे बूब्स हवा में पागलों की तरह झूल रहे थे।
“राहुल… देखो… भैया मुझे कितना गहरा पेल रहे हैं… आअह्ह! कूपे में तो तुम… तुम थक गए थे, लेकिन यहाँ देखो…” सपना हांफते हुए, कैमरे के बेहद करीब आकर सिसक रही थी। उसकी लार का एक कतरा होठों से टपक कर स्क्रीन के सामने गिरा।
“सपना! जान… मुझसे नहीं देखा जा रहा! भैया, प्लीज थोड़ा रुकिए… मेरे लिए भी कुछ छोड़ दो! पूरी चूत आज ही मत फाड़ो, मुझे भी आना है वहाँ!” राहुल फोन स्क्रीन पर लगभग गिड़गिड़ा रहा था, उसकी सांसें इतनी तेज थीं जैसे वह खुद उस कमरे में दौड़ रहा हो। वह स्क्रीन पर अपनी उंगलियां फेर रहा था, मानो वह सपना के उन हिलते हुए बूब्स को छूने की कोशिश कर रहा हो।
“तुम्हारे लिए बहुत कुछ बचेगा राहुल, लेकिन पहले इसे देखो,” मैंने कहा और सपना के दोनों पैरों को और चौड़ा करके उसकी गांड पर हाथ से दो-तीन तेज थप्पड़ मारे—’चटाक! चटाक!’ थप्पड़ों की आवाज सुनते ही राहुल के मुंह से एक चीख निकल गई। मैंने अपने लंड को पूरा बाहर निकाला—जो सपना के काम-रस और खून जैसी लाली से चमक रहा था—और फिर पूरे वेग से उसे अंदर धंसा दिया।
“आहहह! भैया! मैं झड़ने वाली हूँ… राहुल… देखो मैं मर जाऊंगी!” सपना ने बेडशीट को दांतों से जकड़ लिया और उसका पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसकी चूत ने मेरे लंड को अंदर वैक्यूम की तरह जकड़ लिया।
स्क्रीन पर राहुल की तड़प और गिड़गिड़ाहट ने कमरे के तापमान को चरम सीमा पर पहुँचा दिया था। वासना का यह खेल अब एक ऐसे मोड़ पर आ चुका था जहाँ पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। राहुल दिल्ली में बैठा बस हाथ मलता रह गया, क्योंकि खेल अभी खत्म नहीं हुआ था।
मैंने सपना को बिस्तर पर दोबारा घोड़ी की पोजीशन में ला दिया। उसकी सुडौल, गदराई गांड सीधे कैमरे के लेंस के सामने थी।
“भैया, प्लीज… अब बस करो… रात की ट्रेन वाली थकान अभी भी इसके बदन में है, मत तोड़ो उसे इतना…” राहुल फोन के उस पार से लगभग हाथ जोड़ते हुए विनती कर रहा था।
पर मैं कहाँ रुकने वाला था? मैंने उसकी विनती को हवा में उड़ाते हुए अपने लोहे जैसे कड़े लंड को एक ही झटके में पूरी ताकत से अंदर धंसा दिया। ‘पकाक-फच’ की एक और जोरदार आवाज गूंजी। सपना के मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली और उसने बेडशीट को अपने हाथों से कस कर भींच लिया।
मैंने बिना रहम खाए खड़े-खड़े ही उसे पीछे से ताबड़तोड़ पेलना शुरू कर दिया। मेरे हर धक्के के साथ सपना का पूरा बदन आगे-पीछे हिल रहा था।
“राहुल… देखो… भैया नहीं मानेंगे… आहह!” सपना ने कैमरे की तरफ देखते हुए अपनी मदहोश आँखें खोली।
इसके बाद मैंने उसे पूरी तरह कुतिया (Doggy style) बना दिया। उसकी गांड को थोड़ा और ऊपर उठा कर मैंने उसकी गांड की ऐसी रेल बनाई कि उसकी पूरी जांघें लाल होने लगी। हर धक्के की थाप—’चट-चट-चट’—सीधे राहुल के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही थी।
राहुल स्क्रीन को देख कर कभी अपना सिर पकड़ता, तो कभी पागलों की तरह अपने लंड को सहलाने लगता। वह बेबस था, सिर्फ एक मूक दर्शक जो अपनी पसंदीदा चीज को किसी और के हाथों तहस-नहस होते देख रहा था।
खेल को और उत्तेजक बनाने के लिए, मैं बिस्तर पर पीठ के बल लेट गया और सपना को अपने ऊपर खींच लिया। अब सपना मेरे लंड के ऊपर सवार थी। उसने अपनी कमर को ऊपर-नीचे उठाना शुरू किया और अपनी चूत को मेरे कड़े लंड पर पूरी तरह सेट करके जोर-जोर से उछलने लगी।
जब सपना पूरी ताकत से मेरे ऊपर उछल रही थी, तो बिना ब्रा के उसके 32 इंच के भारी पपीते जैसे चूचे इतनी तेजी से ऊपर-नीचे उछल रहे थे कि राहुल की आँखें फटी की फटी रह गई।
वह स्क्रीन पर उंगली फेरते हुए बड़बड़ा रहा था, “सपना… रुक जाओ… वो चूचे… उफ्फ, मैंने कूपे में इन्हें कितनी धीरे से छुआ था और अब… तुम पागल कर दोगी मुझे!”
सपना पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी, उसे अब न राहुल की परवाह थी और ना दुनिया की। वह मेरे सीने पर अपने हाथ टिकाए, अपने चूतड़ को मेरे ऊपर पटकी जा रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी भारी सांसें, जिस्मों के टकराने की आवाजें और राहुल की बेबस सिसकियां गूंज रही थीं।
राहुल अपनी स्क्रीन पर इस लाइव तबाही को देख-देखकर अंदर तक टूट चुका था और उसे समझ आ गया था कि गाँव की इस मिट्टी में उसका मुकाबला किसी बेहद शातिर खिलाड़ी से होने वाला है।
रात के सन्नाटे का वो पागलपन अब एक ऐसे अंतहीन सिलसिले में बदल चुका था, जहाँ घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती जा रही थीं, लेकिन हमारे बदन की आग शांत होने का नाम नहीं ले रही थी। दिल्ली के अपने कमरे में बैठा राहुल उस रात एक ऐसी लाचारी और हवस के चक्रव्यूह में फंस चुका था, जिससे निकलना उसके बस में नहीं था। वह इस पूरी लाइव तबाही का इकलौता और बेबस गवाह था।
घड़ी में रात के 2 बजे, फिर 3 बजे… और देखते-देखते सुबह के 4 बज चुके थे। इन दो-ढाई घंटों में मैंने सपना के बदन के हर हिस्से को अपनी मर्जी से निचोड़ा था। ट्रेन के कूपे की तरह ही यहाँ भी रफ्तार पकड़ चुकी थी, लेकिन इस बार राहुल सिर्फ एक दर्शक था जो दिल्ली में बैठा हुआ अपने लंड को पागलों की तरह हिला रहा था। वह स्क्रीन पर सपना की चूत को मेरे लंड से फटते हुए देख रहा था।
फोन के उस पार राहुल की आँखों के नीचे काले घेरे साफ नज़र आने लगे थे। वह थक कर बिस्तर के कोने से टिक गया था, लेकिन उसकी आँखें फोन की स्क्रीन से एक सेकंड के लिए भी नहीं हट पा रही थी। वह देखना नहीं चाहता था, पर हवस का वो नजारा उसे स्क्रीन से नजरें हटाने की इजाजत नहीं दे रहा था।
कमरे में जल रही मोमबत्ती अब पूरी तरह पिघल चुकी थी। भोर की हल्की सी मद्धम सफेदी खिड़की के रास्ते अंदर आने लगी थी, जिसमें सपना का पसीने से लथपथ और मेरा थक चुका लेकिन कड़क बदन साफ दिख रहा था।
“भैया… अब सुबह होने वाली है… प्लीज… राहुल भी रात भर से जाग रहा है…” सपना ने सुबह की 4 बजे की ठंडी हवा में कांपते हुए बेहद थकी हुई आवाज में विनती की। उसकी आवाज पूरी तरह बैठ चुकी थी।
मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कैमरे की तरफ देखा। राहुल स्क्रीन पर बिल्कुल सुन्न पड़ा था। मैंने राहुल से कहा, “देख रहे हो राहुल? ये है गाँव की मिट्टी का दम। तुम्हारी ट्रेन की कुछ घंटों की चुदाई ने इसे सिर्फ थकाया था, लेकिन मेरी इस रात भर की मार ने इसके बदन को पूरी तरह से मेरे रंग में ढाल दिया है।”
राहुल ने बहुत धीमी आवाज में, मानो उसके अंदर की पूरी ताकत खत्म हो चुकी हो, कहा, “आप… आप इंसान नहीं हो भैया। आपने रात के 12 बजे से सुबह के 4 बजा दिए… मेरी आंखों के सामने मेरी बेबी का पूरा बदन लाल कर दिया।
ओह गॉड… भैया… आप तो सच में कमाल हो… सपना, मैं आ रहा हूँ। इसी हफ्ते मैं गाँव आ रहा हूँ, मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं होता!” राहुल ने स्क्रीन पर देखते-देखते ही अपना वीर्य अपनी ही छाती पर खाली कर दिया और हांफने लगा।
लेकिन याद रखना… इस शुक्रवार को मैं आ रहा हूँ। जो कसर आपने छोड़ी है, उसे मैं अपने तरीके से पूरा करूँगा।”
सुबह के 4 बजे की उस आखिरी बाजी में, मैंने सपना को एक आखिरी बार कस कर अपनी बाहों में भींचा उधर राहुल दिल्ली में बैठा-बैठा इस चरम सीमा को देख कर अपनी सुध-बुध खो बैठा। “सपना… मैं भी… मैं भी रुक नहीं पा रहा… ओहहह!” कहते हुए राहुल ने फोन की स्क्रीन पर ही, जहाँ सपना का चेहरा दिख रहा था, अपने लंड से निकलने वाले गर्म वीर्य की धार छोड़नी शुरू कर दी। उसका गाढ़ा माल उसके हाथ और फोन की स्क्रीन पर बिखर गया।
फोन के उस पार, राहुल पसीने से लथपथ, हांफता हुआ अपनी स्क्रीन को साफ कर रहा था। उसकी आँखों में हवस, जलन और तड़प का एक ऐसा मिश्रण था जिसने साफ कर दिया था कि अब वह ज्यादा दिन दिल्ली में नहीं रुकने वाला।
“मैं आ रहा हूँ… इसी शुक्रवार की ट्रेन से मैं गाँव आ रहा हूँ,” राहुल ने हांफते हुए फोन काटने से पहले आखिरी बार कहा।
इधर मैंने भी एक आखिरी, सबसे गहरा धक्का मारा और अपना सारा गर्म वीर्य सपना की चूत की गहराइयों में उड़ेल दिया। हम दोनों हांफते हुए कैमरे के सामने ही बिस्तर पर गिर पड़े। वीडियो कॉल अभी भी ऑन था, जिसमें सिर्फ हमारी हांफने की आवाजें आ रही थीं। राहुल ने बिना कुछ कहे, एक गहरी सांस लेते हुए आखिरकार फोन काट दिया।
अब कूपे की वो कहानी बहुत पीछे छूट चुकी थी, और आने वाले शुक्रवार को गाँव के इन खेतों में एक नया, त्रिकोणीय खेल शुरू होने वाला था।
मैंने सपना के अंदर अपना माल गिराया और राहुल से कहा, “टिकट बुक करा ले राहुल। गाँव की इस मिट्टी में इस बार कूपे से भी ज्यादा भयानक खेल होगा।”
आगे की कहानी में देखें , राहुल जब दिल्ली से गाँव पहुँचता है, तो कैसे सपना के भाई के सामने, गाँव के गन्ने के खेतों के बीच शुरू होता है असली थ्रीसम (Threesome) का खूनी खेल? जानने के लिए बने रहिए अपने भाई राजू के साथ धन्यवाद ।
कमेन्ट करके जरूर बताएं कहानी कैसी लगी ।
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