छोटी बहन सपना की बम्पर चुदाई अलग-अलग लंड से-10 (Chhoti behan Sapna ki bumper chudai alag-alag lund se-10)

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पिछला भाग पढ़े:- छोटी बहन सपना की बम्पर चुदाई अलग-अलग लंड से-9

आशा है आपने पिछली को कहानी पढ़ लिया होगा कि कैसे राहुल ने सपना को करवट बदल-बदल कर अलग-अलग पोजीशन में धक्कम-पेल चोद-चोद कर खुश कर दिया था। लेकिन खेतों की उस भारी उमस और तनाव के बीच अचानक माहौल ने एक नई करवट ली। राहुल का गुस्सा और पागलपन प्यार में बदल रहा था, वह धीरे-धीरे शांत होने लगा। जब उसने देखा कि सपना का बदन दर्द से पूरी तरह टूट रहा है और मैं भी गुस्से में उसकी तरफ बढ़ रहा था, तो उसने अपनी रफ्तार पर ब्रेक लगाया।

राहुल ने अपनी सांसों को काबू में किया, अपनी उग्रता को छोड़ा और स्पीड को बिल्कुल धीमा कर दिया।

अब वह बेरहमी से झटके मारने के बजाय, बेहद धीमे-धीमे और गहरे धक्के लगाने लगा। रफ्तार कम होते ही सपना की तीखी चीखें बंद हो गई। जो रास्ता अब तक सिर्फ दर्द दे रहा था, वह इस धीमे और मखमली स्पर्श से धीरे-धीरे खुलने लगा।

राहुल ने अपना गुस्सा भुला कर अब प्यार और सिहरन का तड़का लगाना शुरू किया। उसने सपना के पसीने से भीगे बालों को पीछे किया और उसके कानों के पास धीरे से फुसफुसाया, “सॉरी जान… अब दर्द नहीं होगा।”

जैसे ही लंड की वो कड़क गरमाहट बिना दर्द के अंदर तक उतरने लगी, सपना का पूरा बदन जो अब तक कड़ा था, वह बिल्कुल ढीला और शांत हो गया। उसकी आँखों के आँसू थम गए और उनकी जगह कामुकता का एक नया रंग चढ़ने लगा।

धीमी और लगातार मिल रही इस छुअन ने सपना के अंदर छिपी हवस को दोबारा जगा दिया। अब वह दर्द से भाग नहीं रही थी, बल्कि खुद अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेल कर राहुल के हर धीमे धक्के का पूरा स्वागत करने लगी।

कमरे की उस लाइव चैटिंग की तरह, अब इस गन्ने के खेत में भी ‘फच-फच’ की रसीली और मद्धम आवाजें गूंजने लगी। सपना ने अपनी आँखें आधी मूंद ली और राहुल के चौड़े कंधों पर अपने हाथ फेरते हुए मजे से सिसकने लगी।

“उहहह… राहुल… हाँ… अब सही है… ऐसे ही… धीरे-धीरे पूरा अंदर तक जाने दो…” सपना के मुंह से अब दर्द की जगह सुख के सुर निकलने लगे थे।

मैं भी जो गुस्से में आगे बढ़ा था, वहीं रुक गया। जब मैंने देखा कि सपना अब खुद उस खेल का मजा ले रही है और राहुल का उग्र रूप अब एक कुशल खिलाड़ी में बदल चुका है, तो मेरे चेहरे पर भी एक तृप्त मुस्कान लौट आई। गाँव की उस दोपहर में, गन्ने के पत्तों की सरसराहट के बीच, अब हवस का वो डरावना खेल एक बेहद खूबसूरत और कामुक अंत की तरफ बढ़ रहा था।

गन्ने के उस घने खेत में दोपहर की उमस अपने चरम पर थी। राहुल की धीमी और गहरी रफ्तार ने सपना को पूरी तरह मदहोश कर दिया था। उसकी सिसकारियां अब दर्द की नहीं, बल्कि पूरी तरह से आनंद की थी। मैं पास ही खड़ा इस पूरे नजारे को देख रहा था कि तभी राहुल ने मेरी तरफ मुड़ कर देखा।

उसकी आँखों से अब वह पुराना गुस्सा और जलन पूरी तरह गायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक थके हुए लेकिन संतुष्ट खिलाड़ी की मुस्कान थी।

“भैया, अकेले-अकेले इस सफर का मजा लेने में वह बात नहीं है,” राहुल ने हांफते हुए और गति को थोड़ा धीमा करते हुए कहा। “आखिरकार, इस बदन के असली हकदार तो आप ही हैं। दिल्ली में बैठ कर मैंने जो देखा था, आज मैं उसे अपनी आँखों के सामने लाइव देखना चाहता हूँ। आओ, अब आप भी इस खेल को पूरा करो।”

राहुल का यह न्योता मिलते ही मेरे बदन में बची-कुची बंदिशें भी टूट गई। पैंट के अंदर मेरा लंड पहले ही लोहे की तरह सख्त हो चुका था।

सपना ने भी अर्ध-मूर्छित आँखों से मेरी तरफ देखा और अपनी मखमली आवाज़ में फुसफुसाए, “भैया… आ जाओ ना… अब दोनों मिल कर मुझे पूरी तरह से शांत कर दो।”

मैंने बिना कोई वक्त गंवाए अपने कपड़े उतार फेंके। मेरा 8 इंच का मूसल जैसा लंड हवा में तन कर खड़ा था। मैंने आगे बढ़ कर सपना के सिर को अपनी तरफ घुमाया। राहुल पीछे से लगातार अपनी धीमी और रसीली चाल बनाए हुए था, जिससे सपना का पूरा बदन आगे-पीछे हिल रहा था।

मैंने सपना के गुलाबी होठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया और पागलों की तरह चूसने लगा। अब मेरठ, दिल्ली और कूपे की सारी कहानियां इस एक गन्ने के खेत में आकर मिल चुकी थी। राहुल पीछे से अपनी लय में धक्के मार रहा था और मैं सामने से सपना के मुंह को अपने लंड के रस से सराबोर करने की तैयारी में था। गन्ने की सूखी पत्तियों पर इस त्रिकोणीय खेल की ‘चट-चट’ और ‘फच-फच’ की आवाजें अब और तेज होने वाली थी।

गन्ने के उस घने खेत में चल रहा यह सिलसिला अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा था। दोपहर की धूप धीरे-धीरे ढलने लगी थी और हवा में एक हल्की सी ठंडक घुलने लगी थी, लेकिन उस घेरे के अंदर की गरमाहट अभी भी वैसी ही बनी हुई थी।

राहुल ने अपनी गति को और धीमा किया, जिससे सपना को थोड़ा आराम मिला। राहुल के चेहरे पर अब थकान के साथ-साथ एक अजीब सा सुकून था। उसने मेरी तरफ देखा और अपनी पकड़ थोड़ी ढीली करते हुए कहा, “भैया, अब इस कहानी को आप ही पूरा कीजिए। मैंने इस सफर की जो शुरुआत की थी, उसका अंत आपके बिना अधूरा है।” कहते हुए वो सपना के गांड में ही झड़ गया। और सपना को एक जोर का धक्का मारते हुए सपना की चूचियों को जोर से पकड़ कर दबाने लगा, ये देख मैं समझ गया कि उसकी पिचकारी अब पूरी तरह से खाली हो रही थी।

राहुल के झड़ते ही सपना ने गहरी सांस लेते हुए अपनी आँखें खोली। उसके चेहरे पर अब कोई डर या झिझक नहीं थी। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरी बांह को थाम लिया। “भैया, अब घर लौटने का वक्त भी हो रहा है… इससे पहले कि शाम ढले, आप भी इस सफर का हिस्सा बन जाओ,” सपना ने थकी हुई लेकिन गहरी आवाज में कहा।

मैंने आगे बढ़ कर राहुल की जगह ली। राहुल थोड़ा पीछे हट कर गन्ने के एक ऊंचे झुंड के सहारे खड़ा हो गया और गहरी सांसें लेते हुए हमें देखने लगा। मैंने सपना को सहारा देकर उठाया और उसे एक नई पोजीशन में व्यवस्थित किया। मेरा बदन पूरी तरह तैयार था, और जैसे ही मैंने उसे अपनी बाहों में समेटा, मेरठ के कॉलेज के दिनों से लेकर ट्रेन के कूपे तक की सारी यादें एक पल में सिमट गई।

मैंने एक गहरा और सधा हुआ धक्का मारा, जिससे सपना के मुंह से एक धीमी सिसकारी निकली। राहुल ने दूर खड़े होकर इस नजारे को देखा और उसके चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान आ गई। वह समझ गया था कि चाहे कोई भी शहर या सफर हो, इस गाँव की मिट्टी का अपना एक अलग ही वजूद था।

करीब दस मिनट के इस आखिरी सिलसिले के बाद, हम तीनों पूरी तरह शांत हो गए। खेतों का सन्नाटा एक बार फिर लौट आया था। राहुल ने जमीन से अपना बैग उठाया, अपने कपड़े ठीक किए और हमारी तरफ देख कर बोला, “वाकई, यह सफर मेरी जिंदगी का सबसे यादगार सफर रहेगा।”

सूरज पूरी तरह डूबने को था जब हमने अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट की। सपना पीछे बैठी थी, और इस बार उसके चेहरे पर एक अलग ही संतुष्टि और गरिमा थी। राहुल को वापस स्टेशन छोड़ने के लिए गाड़ी पगडंडी से होते हुए मुख्य सड़क की ओर बढ़ चली, और इसके साथ ही मेरठ, कूपे और खेतों की यह दास्तान हमेशा के लिए पूरी हो गई।

खेतों के उस धमाकेदार और थका देने वाले खेल के बाद जब हम सब घर लौटे, तो राहुल को विदा करने का समय आ चुका था। लेकिन राहुल और सपना की आँखों में अभी भी एक-दूसरे के लिए तड़प साफ दिख रही थी। मैंने राहुल से पूछा, “क्या हुआ भाई?” तो वो बोला, “यार राजू भाई मुझे सपना को छोड़ कर जाने का मन नहीं कर रहा।‌ यार ये सच में बहुत खूबसूरत लड़की है। इसकी चूत और गांड बहुत रसीली है। मन कर रहा कि इसे यहीं से भगा ले जाऊं और दिन रात इसे चोद-चोद कर अपनी रंडी बना लूं। क्यूं सपना मैं तुम्हे पसन्द आया या नहीं? मेरे साथ चलना पसन्द करोगी? मेरे साथ हर रात रंगीन करना चाहोगी?”

मैंने सपना की आंखों मे भी राहुल के लिए कुछ अलग महसूस किया, पर गाँव की बंदिशों के बीच यह त्रिकोणीय रोमांच पूरी तरह खुल कर सामने नहीं आ पा रहा था। तभी मेरे दिमाग में एक शातिर आइडिया आया, और अपना आईडिया दोनों को बताया और फिर राहुल को स्टेशन छोड़ आया।

उसी रात डिनर के टेबल पर जब सब बैठे थे, तो मैंने माहौल को भांपते हुए अपनी चाल चली। “पापा, सपना का कॉलेज अब पूरी तरह खत्म हो चुका है। आगे की पढ़ाई या शादी की तैयारियों से पहले इसके सभी दोस्तों ने मिल कर एक ट्रिप का प्लान बनाया है। राहुल भी मेरठ से इसी सिलसिले में आया है। अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं और सपना भी इनके साथ कुछ दिनों के लिए शिमला घूम आएं? वैसे भी आगे इसे फुर्सत कहाँ मिलेगी।”

पापा: ये राहुल कौन है?

मैं: पापा मेरे कालेज का दोस्त है सपना भी मिल चुकी है उससे।

सपना: हां पापा बहुत अच्छा दोस्त है भैया का मैं भी मिली थी।

पापा: तुम कब मिली थी राहुल से?

सपना कुछ बोलती तब तक मैंने बोला, “अभी आज सुबह ही जब हम सब बाहर गए थे, तभी मिले थे। अच्छा वक्त बीता साथ में। बहुत सी बातें हुई। पूरा मूड फ्रेश हो गया मेरा भी और सपना का तो पूछिए मत। वो तो अब एक-दम से फ्रेश हो गयी है, जब से हम दोनों दोस्तों से ये मिल कर बात-चीत की।”

मम्मी-पापा ने पहले तो थोड़ा संकोच किया। लेकिन जब मैंने जिम्मेदारी अपने सिर ली और कहा कि मैं खुद सपना के साथ जा रहा हूँ, तो वे मान गए। पापा ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, घूम आओ। वैसे भी पढ़ाई के बाद थोड़ा मन हल्का हो जाएगा।”

सपना ने टेबल के नीचे से मेरा पैर दबाया। उसकी आँखों में इस आजादी को देख कर एक चमक आ गई थी। राहुल ने भी राहत की सांस ली।

आगे की कहानी में आपको शिमला की उस सर्द रात की नमकीन कहानी पढ़ने को मिलेगी। तब तक के लिए अलविदा, कमेन्ट करके जरूर बताएं ये कहानी आपको कैसी लगी।

धन्यवाद !

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