पिछला भाग पढ़े:- शिमला में ट्रुथ डेयर खेल, दोनों बहनें चुदी रेलम पेल-8
आशा है आपने पिछली सेक्स कहानी को पढ़ लिया होगा कि कैसे राहुल ने काव्या को थका कर उसको अपना गुलाम बना लिया था, और काव्या को चोद-चोद कर उसकी हालत खराब कर दी। काव्या का शरीर अब पूरी तरह से ढीला पड़ता जा रहा था। लेकिन राहुल की हवस और उसका बदला अभी भी शांत नहीं हुआ था। वह लगातार उसे अपने नीचे रौंदे जा रहा था, और शिमला के उस बंद कमरे में काव्या की बेबसी और दर्द की गूंज रोंगटे खड़े कर देने वाली थी।
राहुल की बेरहमी के उस चरम के बाद, जब काव्या की आँखों से बहते आँसू और उसकी बेबसी अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच गई, तो राहुल के भीतर का वहशीपन धीरे-धीरे शांत होने लगा। काव्या के बदन का थरथराना और उसका इस कदर गिड़गिड़ाना अब राहुल के गुस्से को पिघलाने लगा था। बदले की आग शांत हो चुकी थी और अब उसकी जगह एक अजीब सी कशिश और धीमे अहसास ने ले ली।
राहुल ने अपनी रफ्तार को थोड़ा धीमा किया। उसने काव्या के बालों से अपनी मजबूत पकड़ ढीली की और उसके कांपते हुए गोरे बदन को अपनी छाती से चिपका लिया। दर्द से धीरे-धीरे रोमांस की तरफ बदलती बात-चीत-
राहुल (अपनी आवाज को धीमा और भारी करते हुए, हाँफते हुए): “काव्या… शांत हो जाओ। बस… अब और दर्द नहीं दूँगा। मैं बस तुम्हें यह जताना चाहता था कि तुम मेरे लिए क्या मायने रखती हो।”
काव्या (सिसकते हुए, अपना सिर उसके सीने पर टिका कर): “तुम… तुम बहुत बुरे हो राहुल। तुमने मुझे बहुत तड़पाया… अंदर अभी भी बहुत तेज मीठा-मीठा दर्द हो रहा है। पर… अब तुम इतने धीमे क्यों हो गए?”
राहुल (उसके गालों पर बहते आँसुओं को अपने होंठों से चूमते हुए): “क्योंकि तुम्हारी आँखों में ये आँसू मुझसे और देखे नहीं जा रहे। तुम्हारा यह तड़पना जितना मुझे पागल कर रहा था, उतना ही अब मुझे तुम्हारे इस बदन से प्यार करने पर मजबूर कर रहा है। देखो, मैं रुक गया हूँ…”
काव्या (एक गहरी सांस लेते हुए, उसकी छाती पर अपने हाथ फेरते हुए): “आह्ह… सच में रोक दिया? पर… तुम्हारा यह अहसास… अब बहुत अलग लग रहा है। जब तुम धीरे-धीरे अंदर हलचल कर रहे हो, तो वह जलन अब धीरे-धीरे एक अजीब से नशे में बदल रही है…”
राहुल (उसके कानों के पास हौसले से फुसफुसाते हुए और उसकी कमर को सहलाते हुए): “तो इस नशे को महसूस करो, काव्या। मैंने जो भी किया, तुम्हारी इसी दीवानगी के लिए किया। अब बस मेरे साथ बहती जाओ।”
काव्या (अपनी आँखें बंद करके, राहुल के गले में अपनी बाहें कसते हुए): “उम्म्म… राहुल… अब मुझे दर्द नहीं हो रहा। अब यह बहुत अच्छा लग रहा है। हाँ… इसी तरह… बिल्कुल धीरे-धीरे… मुझे अपने करीब रखो…”
कमरे में हीटर की मद्धम लाल रोशनी अब और ज्यादा गहरी और सुलगती हुई महसूस हो रही थी। काव्या की चीखें और सिसकियां अब धीरे-धीरे मदहोश कर देने वाली आहों में तब्दील हो चुकी थी। राहुल के धीमे और प्यार भरे झटकों के साथ काव्या का बदन भी धीरे-धीरे उसकी लय में ताल मिलाने लगा था, और वह शिमला की बर्फीली सुबह के उजाले में पूरी तरह से प्यार के एक नए समंदर में गोते लगा रही थी।
राहुल के धीमे और मखमली झटकों ने काव्या के भीतर के सारे दर्द को एक मीठी सी खुजली और बेइंतहा चाहत में बदल दिया था। जो कमरा कुछ देर पहले तक सिसकियों और चीखों से गूंज रहा था, अब वहां सिर्फ दो जिस्मों के आपस में घिसने की सरसराहट और मदहोश सांसों का शोर था।
काव्या का गोरा बदन अब हीटर की तपन और राहुल की छुअन से पूरी तरह गुलाबी हो चुका था। वह पूरी तरह हार मान चुकी थी, लेकिन यह हार अब उसे एक अजीब सा सुकून दे रही थी।
राहुल (काव्या के होंठों के बेहद करीब अपनी सांसें छोड़ते हुए): “अब बताओ काव्या… क्या अब भी मैं बुरा हूँ? क्या अब भी तुम्हें सिर्फ दर्द मिल रहा है?”
काव्या (मदहोशी में अपनी आँखें अधखुली रखते हुए, राहुल की गर्दन को चूमते हुए): “उम्म्म… नहीं राहुल… तुम बहुत… बहुत जादुई हो। मुझे नहीं पता था कि दर्द के बाद इतना मीठा अहसास भी होता है। मुझे अपनी बाहों में और कस लो… मुझे छोड़ना मत।
राहुल (उसकी कमर को धीरे से ऊपर उठाते हुए और एक गहरा, प्यार भरा धक्का मारते हुए): “मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा, काव्या। आज के बाद तुम्हारी इस खूबसूरती पर सिर्फ मेरा हक रहेगा। देखो, कैसे तुम्हारा पूरा जिस्म मेरे साथ पिघल रहा है।”
काव्या (एक लंबी और गहरी आह भरते हुए): “आह्ह… हाँ राहुल… मैं पूरी तरह पिघल रही हूँ। तुम्हारी यह धीरे-धीरे बढ़ती हुई गहराई मुझे अंदर तक हिला रही है। प्लीज… अब अपनी रफ्तार थोड़ी बढ़ाओ… मुझे उस मुकाम तक ले जाओ जहाँ सिर्फ तुम और मैं हूँ…”
राहुल (मुस्कुराते हुए, उसकी आँखों में आँखें डालकर): “जैसी तुम्हारी मर्जी, मेरी जान…”
उधर बेड पर बैठी सपना और मैं (राजू) इस पूरे बदलाव को देख रहे थे। सपना की सांसें भी अब बेकाबू हो चुकी थी। काव्या और राहुल का यह प्यार भरा समर्पण देख कर सपना का सब्र पूरी तरह टूट चुका था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपनी नंगी छाती पर रख दिया।
“राजू भाई…” सपना ने कापंती हुई आवाज में कहा, “अब और नहीं सहा जाता। उधर देखो, काव्या कैसे राहुल के प्यार में खो गई है। अब मुझे भी तड़पाना बंद करो और मुझे अपनी बाहों में ले लो।”
मैंने मुस्कुराते हुए सपना को अपने नीचे खींच लिया। शिमला के उस सुइट में, सुबह की गुनगुनी धूप खिड़की के पर्दों को पार कर अंदर आ रही थी, जहाँ अब चारों जिस्म अपनी-अपनी कशिश और प्यार के समंदर में पूरी तरह डूब चुके थे। रात का वह खौफनाक और बेबाक खेल अब एक मुकम्मल और खूबसूरत सुबह की शुरुआत बन चुका था।
शिमला की वह बर्फीली सुबह अब अपने सबसे आखिरी और चरम मुकाम पर पहुँच चुकी थी। राहुल ने काव्या को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। दर्द से शुरू हुआ यह खेल अब पूरी तरह से समर्पण और बेकाबू हवस के समंदर में तब्दील हो चुका था।
राहुल के लगातार और सधे हुए झटकों ने काव्या के सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह शून्य कर दिया था। वह बस राहुल के बदन की गर्मी और उसकी छुअन के नशे में बही जा रही थी।
राहुल (हाँफते हुए, पूरी ताकत समेट कर): “अब बताओ काव्या… तुम पूरी तरह से किसकी हो? कौन है तुम्हारा असली मालिक?”
काव्या (पूरी तरह मदहोश, अपनी आँखें बंद किए हुए): “आह्ह… राहुल… सिर्फ तुम्हारी… मुझे अपनी दासी बना लो… पर अब रुको मत… मुझे मेरा मुकाम दे दो…”
राहुल ने जब काव्या के मुंह से यह बात सुनी, तो उसका पुरुषार्थ चरम पर पहुँच गया। उसने आखिरी के कुछ बेहद गहरे और ताबड़तोड़ धक्के मारे, जिसने काव्या के पूरे बदन को थरथरा कर रख दिया। काव्या ने जोर से राहुल की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए और एक तीखी आह भरी।
उसी पल, राहुल ने अपने शरीर का पूरा नियंत्रण खो दिया। उसने अपने पूरे सब्र और ताकत को समेटते हुए, अपनी जिंदगी का सारा रस (गन्ने का रस) काव्या की गहराई में पूरी तरह उड़ेल दिया। वह गर्म अहसास जैसे ही काव्या के भीतर फैला, वह सुख के सागर में डूब गई।
जब यह बवंडर शांत हुआ, तो दोनों के जिस्म पूरी तरह पसीने से भीग चुके थे। राहुल अपनी पूरी ताकत निचोड़ने के बाद निढाल हो चुका था। वह बिना खुद को अलग किए, सीधे काव्या के नरम और थके हुए बदन के ऊपर ही ढह गया। उसने अपना चेहरा काव्या की गर्दन में छिपा लिया और वहीं गहरी सांसें लेने लगा।
काव्या ने भी थक कर अपनी आँखें बंद कर ली। उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा संतोष और सुकून था। उसने अपने कमजोर हाथों से राहुल की पीठ को थपथपाया, मानो वह इस अधिकार को पूरी तरह स्वीकार कर चुकी हो।
कमरे के दूसरी तरफ, सपना और मैं भी शांत हो चुके थे। हीटर की मद्धम गरमाहट और खिड़की से आती सुबह की पहली किरण इस बात की गवाह थी कि शिमला की वह रात अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थी, लेकिन अपने पीछे चार जिंदगियों के ऐसे राज छोड़ गई थी जो कभी भुलाए नहीं जा सकते थे।
सुबह के 5 बज चुके थे जब कमरे का वह तूफानी बवंडर शांत हुआ और चारों तरफ एक गहरी खामोशी छा गई। कड़कती ठंड में थके-हारे और पूरी तरह से निढाल होकर चारों गहरी और बेखबर नींद में सो गए।
सुबह जब करीब 10 बजे सबकी आँखें खुली, तो हीटर की गर्मी के बीच कमरे में गुनगुनी धूप फैल चुकी थी। जब सब ने एक-दूसरे की तरफ देखा, तो सबके चेहरों पर रात की उस बेबाक हलचल का असर साफ नज़र आ रहा था। आँखों में नींद का भारीपन था, बदन टूट रहा था और चेहरे पर एक अजीब सी थकान के साथ-साथ एक संतुष्टि भरी मुस्कान भी थी।
सपना ने अंगड़ाई लेते हुए कहा, “यार, शिमला आए हैं, चलो तैयार होते हैं और मॉल रोड घूमने चलते हैं।”
लेकिन जैसे ही काव्या ने बिस्तर से उठने की कोशिश की, उसके मुंह से एक हल्की सी कराह निकल गई। रात को राहुल के बेरहम और ताबड़तोड़ धक्कों के कारण उसकी जांघों और कमर में बहुत तेज़ मीठा-मीठा दर्द हो रहा था।
काव्या ने खुद को चादर में लपेटते हुए थके स्वर में कहा, “दीदी, प्लीज आज मुझे कहीं नहीं जाना। मेरा पूरा बदन टूट रहा है और मुझसे तो पैर भी सीधे नहीं रखे जा रहे। मैं बहुत ज्यादा थक गई हूँ, आज बस कमरे में ही आराम करते हैं।”
काव्या की हालत और उसकी थकावट देख कर राहुल ने भी शरारती मुस्कान के साथ हाँ में सिर हिलाया। आखिर में सब ने यही तय किया कि दोपहर तक कमरे में ही आराम किया जाए और शाम को थोड़ा मौसम सुहाना होने पर बाहर निकला जाए।
क्या काव्या की थकान खत्म होने के बाद घूमने जायेंगे या वो सब घूमने निकल जाएंगे जानने के लिए बने रहिए अपने भाई राजू के साथ धन्यवाद!
कमेन्ट करके जरूर बताएं कहानी कैसी लगी ।
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