पिछला भाग पढ़े:- शिमला में ट्रुथ डेयर खेल, दोनों बहनें चुदी रेलम पेल-11
आशा है आपने पिछली सेक्स कहानी को पढ़ लिया होगा कि कैसे राहुल ने काव्या की गांड मार-मार कर उसको रूला दिया था और बिना किसी के बात को सुने अपनी हवस बुझा रहा था, राहुल बिना कोई रहम दिखाए, धीरे-धीरे अपने कूल्हों को पीछे खींचा और फिर एक और गहरा झटका अंदर मार दिया। हर धक्का काव्या के लिए किसी आरी की तरह चल रहा था। तेल की चिकनाहट के बावजूद उसकी गांड की तंग दीवारें राहुल के लंड को कस कर जकड़े हुए थीं, जिससे राहुल का मजा और भी ज्यादा बढ़ रहा था।
काव्या अब पूरी तरह बेदम हो चुकी थी। उसके रोने की आवाज अब धीमी और सिसकियों में तब्दील होने लगी थी, लेकिन राहुल की बेरहमी अभी बस शुरू ही हुई थी। वह लगातार गहरी सांसें लेते हुए काव्या के इस अनछुए हिस्से को बेरहमी से रौंदे जा रहा था।
राहुल का हर धक्का अब पहले से कहीं ज्यादा गहरा और बेरहम होता जा रहा था। काव्या का पूरा शरीर दर्द के मारे सुन्न पड़ चुका था, और उसकी जांघों के बीच से तेल के साथ मिल कर खून की कुछ हल्की बूंदें सफेद चादर पर टपकने लगी थी। दर्द की यह हद अब काव्या के बर्दाश्त की सीमा को पार कर चुकी थी, लेकिन राहुल पर इस वक्त जैसे हवस और बदले का भूत सवार था।
उसने काव्या के दोनों हाथों को उसके सिर के ऊपर ले जाकर एक हाथ से मजबूती से दबोच लिया और दूसरे हाथ से उसके कूल्हों को जकड़ कर ताबड़-तोड़ झटके मारने लगा।
काव्या (कमजोर और घुटती हुई आवाज में, सिसकते हुए): “अब… अब और मत मारो राहुल… मैं सच में मर जाऊँगी… आह्ह! अंदर सब तबाह हो गया है… तुम जीत गए… राहुल, तुम जीत गए… मुझे अपनी दासी बना लो, पर अब रहम करो…”
राहुल (हाँफते हुए, उसकी गर्दन पर अपने दाँत गड़ाते हुए): “हाँ! यही सुनना चाहता था मैं तेरे मुंह से! अब आई ना औकात पर? बोल, किसकी गांड फट रही है आज? बोल कि तू सिर्फ मेरी रखैल है!”
काव्या (रोते हुए, पूरी तरह हार मान कर): “हाँ… मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ… तुम्हारी रखैल हूँ… तुम्हारी गुलाम हूँ… जो मर्जी आए करो… पर प्लीज अब यह दर्द खत्म करो… आह्ह!”
काव्या के मुंह से पूरी तरह समर्पण की यह बातें सुन कर राहुल के भीतर का वहशीपन अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच गया। उसकी सांसें बेहद तेज और गरम हो चुकी थी। उसने काव्या की गांड की उस तंग और लहूलुहान गहराई में अपने लंड को आखिरी बार पूरी ताकत से भीतर तक ठोक दिया और वहीं रुक गया।
उसका पूरा बदन एक जोर के झटके के साथ कांप उठा, और उसने अपना सारा गरम गुबार काव्या की गांड के सबसे गहरे हिस्से में खाली कर दिया। काव्या ने दर्द और राहत की एक आखिरी मिली-जुली चीख मारी, और उसकी आँखें पूरी तरह बंद हो गई।
राहुल थका-हारा सीधे काव्या के नाजुक और बेजान पड़े बदन पर ढह गया। कमरे में हीटर की लाल रोशनी और चादर पर फैले खून के लाल धब्बे इस खौफनाक और वहशी खेल के मुकम्मल होने की गवाही दे रहे थे। सपना और राजू दूर बैठे फटी आँखों से इस खौफनाक मंजर को देख रहे थे, जहाँ अब सिर्फ चारों तरफ भारी सांसों का सन्नाटा पसरा हुआ था।
20 मिनट तक उस असहनीय दर्द को सहने और राहुल के लगातार प्रहारों के बाद, काव्या के शरीर का रक्षा तंत्र पूरी तरह टूट गया। धीरे-धीरे, उस भयानक दर्द की जगह एक अजीब सी सुन्नता और फिर धीरे-धीरे उत्तेजना की एक नई, अनजानी लहर ने ले ली। दर्द के उस पार जो चरम सुख छिपा था, अब काव्या उसे महसूस करने लगी थी। उसने खुद को पूरी तरह राहुल के हवाले कर दिया और दर्द के बावजूद खुद अपनी कमर उठा कर राहुल के झटकों का साथ देने लगी।
यह देख कर कमरे का माहौल और भी ज्यादा वहशी और बेकाबू हो गया। जब राहुल काव्या की गांड मारते हुए पूरी तरह निढाल हो गया, तो खेल का असली दौर शुरू हुआ। अब काव्या का डर पूरी तरह से खत्म हो चुका था और वह हवस के एक ऐसे दलदल में उतर चुकी थी जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं थी। मैंने और राहुल ने मिलकर पूरी रात काव्या के जिस्म को आपस में बांटने का फैसला किया।
हम दोनों ने मिल कर काव्या को बिस्तर के बीच में ला दिया। जब राहुल उसकी गांड को अपने गहरे झटकों से बेहाल करता, तो मैं उसकी चूत को अपनी पूरी ताकत से रौंदता।
काव्या का मदहोश समर्पण: काव्या अब दोनों तरफ से आ रहे इन भारी प्रहारों को झेलते हुए पूरी तरह बौरा चुकी थी। उसके मुंह से अब दर्द की चीखें नहीं, बल्कि बेकाबू सिसकियां और “आह… और तेज… मुझे फाड़ दो…” जैसी मदहोश आवाजें निकल रही थी।
इस पूरे सिलसिले में सपना ने एक बेहद खास और उत्तेजक भूमिका निभाई। उसे पता था कि काव्या का बदन इस भारी दोहरे हमले से जल्दी थक सकता था, इसलिए उसने समय-समय पर काव्या को गर्म रखने का जिम्मा संभाला।
जब भी काव्या थक कर ढीली पड़ने लगती, सपना उसके पास लेट जाती। वह काव्या के होंठों को गहराई से चूमती, उसके स्तनों को सहलाती और उसके कानों में उत्तेजक बातें फुसफुसा कर उसे दोबारा जगा देती। सपना का यह साथ काव्या के भीतर की आग को बुझने नहीं दे रहा था, जिससे वह पूरी रात हम दोनों के नीचे बिना रुके चोदे जाने के लिए तैयार रही।
यह सिलसिला रात के 9 बजे से शुरू होकर सुबह की पहली किरण फूटने तक लगातार चलता रहा। पूरी रात कमरे में जिस्मों के टकराने, सिसकियों, चीखों और भारी सांसों का शोर गूंजता रहा।
जब सुबह के 5 बजे यह खौफनाक और सुहाना तूफान थमा, तो पूरा कमरा बिखरा हुआ था। चादरें पूरी तरह से तहस-नहस थीं, तेल और पानी के दाग हर तरफ फैले थे। काव्या अब पूरी तरह से बेदम, लेकिन एक अद्भुत संतुष्टि के साथ हम दोनों के बीच निढाल पड़ी थी। सपना भी उसके बगल में थकी-हारी लेटी हुई थी। शिमला की वह बर्फीली रात अब हमेशा के लिए इन चारों की जिंदगियों में हवस और समर्पण की सबसे बड़ी दास्तान बन कर दर्ज हो चुकी थी।
शिमला की हसीन वादियों में बिताई वह बेबाक रात अब हमारे जिस्मों के रोम-रोम में बस चुकी थी। दूसरे दिन दोपहर तक आराम करने के बाद, जब हम चारों दोबारा तैयार होकर शिमला की नई जगहों को एक्सप्लोर करने निकले, तो मौसम बेहद सुहावना था। हल्की धुंध और बर्फीली हवाओं के बीच हम मॉल रोड से थोड़ा आगे की तरफ बढ़ रहे थे।
लेकिन इस हसीन वादियों की सैर के बीच, हमारी नज़रें और किस्मत कुछ ऐसे टकराई कि एक नए और बेहद रोमांचक खेल की नींव वहीं पड़ गई।
पहाड़ी के एक खूबसूरत व्यू-पॉइंट पर चाय पीते वक्त हमें दो और नए शादी-शुदा जोड़े मिले। वे भी दिल्ली की तरफ से घूमने आए थे और उनकी शादी को मुश्किल से साल भर ही हुआ था। लेकिन वहाँ जो नज़रों का खेल शुरू हुआ, उसने हम सबके भीतर एक अलग ही चिंगारी भड़का दी।
वे दोनों लड़के काव्या और सपना को काफी देर से लगातार ताड़ रहे थे। काव्या के चेहरे पर रात की चुदाई का वह सुस्त और मदहोश अहसास साफ झलक रहा था, और सपना अपने पूरे निखार पर थी।
वे दोनों आपस में धीरे-धीरे बुदबुदा रहे थे, लेकिन पहाड़ों की खामोशी में उनकी बातें हमारे कानों तक पहुँच ही गई: “भाई, क्या कयामत चीजें हैं दोनों… कसम से, अगर इनमें से एक भी हाथ लग जाए ना, तो शिमला का ट्रिप सफल हो जाए। क्या लाजवाब फिगर हैं दोनों के!”
उधर, मुझे और राहुल को उन दोनों लड़कों की पत्नियाँ बेहद पसंद आ गई। उनकी नई-नई शादी का निखार उनके चेहरों पर साफ दिख रहा था। दोनों का शरीर एक-दम गठीला, भरा हुआ और बेहद आकर्षक था। जैकेट के भीतर से भी उनके भारी-भरकम, गदराए हुए स्तन और टाइट जींस में उनकी गोल, कद्दू जैसी सुडौल गांड देख कर मेरा और राहुल का काबू खो रहा था। हम दोनों मन ही मन पागल हो रहे थे कि काश इन दोनों गर्म भाभियों को चखने का मौका मिल जाए।
राहुल तो वैसे ही शातिर और मौके का फायदा उठाने में उस्ताद था। उसने तुरंत माहौल को भांप लिया और उन दोनों लड़कों के पास जाकर बेहद दोस्ताना अंदाज में बात शुरू कर दी:
“अरे भाई, आप लोग भी दिल्ली से हो क्या? हम भी कल ही आए हैं। यहाँ का मौसम तो सच में कमाल का है!”
रास्ते की इस आम बात-चीत ने बहुत जल्द एक गहरी दोस्ती का रूप ले लिया। दोनों लड़के, जो काव्या और सपना के करीब आने का मौका ढूंढ रहे थे, हमसे बड़ी गर्मजोशी से मिले। वहीं, उनकी पत्नियाँ भी हमारी पर्सनालिटी और बात करने के बेबाक अंदाज से काफी प्रभावित दिख रही थीं।
राहुल (मुझसे आँख मार कर, धीरे से बुदबुदाया): “राजू… शिकार खुद चल कर जाल के पास आ रहा है। इनकी पत्नियों का गठीला बदन देख कर तो मेरी पैंट अभी से टाइट हो रही है। आज रात का कुछ तगड़ा इंतजाम करना ही पड़ेगा।”
मैंने भी मुस्कुरा कर हामी भर दी। शाम ढलने तक हम आठों एक साथ घूम रहे थे, हँस रहे थे और एक-दूसरे के बेहद करीब आ चुके थे। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि नजरों ही नजरों में तय हो चुका यह सौदा आज रात शिमला के सुइट में कौन सा नया बवंडर खड़ा करने वाला था।
हम आठों ने एक कैफ़े में बैठ कर गरमा-गरम कॉफ़ी पी और बातों-बातों में एक-दूसरे के बारे में सारी जानकारी ली। बात-चीत के दौरान मैंने साफ़ देखा कि उन दोनों लड़कों की निगाहें हमारी पार्टनर पर ही टिकी थी। एक लड़का काव्या को रिझाने की पूरी कोशिश में लगा था, तो दूसरा सपना के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था। वे दोनों उनकी ख़ूबसूरती और हाव-भाव देख कर पूरी तरह लट्टू हो चुके थे।
मौका ताड़ कर, मैं उन दोनों लड़कों को वॉशरूम के बहाने थोड़ा अलग ले गया। वहाँ मैंने बेहद सीधे और बेबाक अंदाज़ में उनसे पूछ ही लिया, “भाई, तुम दोनों का इरादा क्या है? काफ़ी देर से मेरी दोनों बहनों जैसी पार्टनर को घूर रहे हो।”
मेरी बात सुन कर वे दोनों पहले तो सकपका गए, लेकिन फिर माहौल को भांपकर उन्होंने अपना दिल खोल दिया।
पहला लड़का: “यार भाई, बुरा मत मानना… पर सच में दोनों कमाल की हैं। हम दोनों का दिल आ गया है उन पर। अगर तुम बुरा ना मानो, तो क्या हमें उनके साथ कुछ हसीन और प्यार भरे लम्हे बिताने का मौका मिल सकता है? हम इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।”
मैंने (जान-बूझ कर चेहरे पर गुस्सा और नाखुशी लाते हुए): “दिमाग तो खराब नहीं है तुम्हारा? वो हमारे साथ आई हैं। ऐसा सोचना भी मत, यह नामुमकिन है।”
यह सुनते ही उन दोनों के चेहरों की हवाइयां उड़ गई। उनके चेहरे की पूरी रौनक ही ख़त्म हो गई और वे बेहद निराश दिखने लगे। तभी राहुल, जो हमारे पीछे-पीछे ही आ गया था, उसने बीच में दखल दिया और अपनी शातिर चाल चल दी।
आखिर राहुल ने क्या चाल चली जानने के लिए बने रहे अपने भाई राजू के साथ धन्यवाद !
कमेन्ट करके जरूर बताएं कहानी कैसी लगी।