रोशनी की हवस (Roshni ki hawas)

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मेरा नाम रोशनी है। उम्र बत्तीस साल। शादी को आठ साल हो चुके थे। पति अच्छा था, लेकिन बिस्तर पर अब बिल्कुल नाकाफी। महीनों से मेरी चूत तरस रही थी। रात भर उंगलियाँ डाल-डाल कर थकान निकालती। लेकिन मन नहीं भरता था। शरीर में आग सुलगती रहती।

एक शाम मैंने फैसला कर लिया। अब और इंतजार नहीं। मैंने एक प्राइवेट ग्रुप में मैसेज किया—

“बत्तीस साल की औरत हूँ। आज रात गैंगबैंग चाहिए। जितने लंड आ सकें, सब आ जाएँ। कोई सीमा नहीं। सिर्फ सहमति वाले मर्द आएँ। जबरदस्ती का कोई काम नहीं चलेगा।”

मैसेज जाते ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई। डर भी था, उत्साह भी। एक घंटे में जवाब आने लगे। सात आदमी तैयार हो गए। सब ने साफ लिखा कि वो सहमति से आ रहे थे। कोई अठारह से कम नहीं था। उम्र पच्चीस से चालीस के बीच थी।

रात के ग्यारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने काले रंग की पतली ब्रा और पैंटी पहन रखी थी। बाल खुले थे। होंठ हल्के लाल। दरवाजा खोला तो सात जोड़ी आँखें मुझ पर टिक गई।

सबसे पहले एक लंबा, मजबूत आदमी अंदर आया। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरा और बोला, “बिल्कुल वैसी ही हो जैसी मैसेज में लिखा था।”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “अंदर आ जाओ। सब आ जाओ।”

दरवाजा बंद होते ही माहौल बदल गया। एक ने मुझे दीवार से सटा दिया। उसके हाथ सीधे मेरे स्तनों पर चले गए। ब्रा खोल दी गई। छत्तीस डी के नरम स्तन बाहर निकल आए। उसने दोनों निपल्स मुँह में ले लिए और जोर-जोर से चूसने लगा। दांत हल्के से काटे तो मेरे मुँह से हल्की कराह निकली।

पीछे से दूसरे आदमी ने मेरी पैंटी खींच ली। पैंटी गीली हो चुकी थी। उसने दो उंगलियाँ मेरी चूत में डाल दी और तेजी से हिलाने लगा।

“कितनी गीली है पहले से,” उसने कहा।

मैंने सिर पीछे किया और जवाब दिया, “बहुत दिनों से तरस रही हूँ… आज पूरा निकालना है।”

तीसरे आदमी ने मेरे मुँह में अपना लंड ठूँस दिया। गर्म, कठोर और नमकीन। मैंने गला खोल कर चूसना शुरू कर दिया। थूक बहने लगा। चारों तरफ हाथ थे। कोई मेरे स्तन मसल रहा था, कोई गांड दबा रहा था, कोई बाल पकड़ कर मुँह में और गहरा लंड धकेल रहा था।

फिर उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया।
एक मोटे लंड वाला आदमी मेरे ऊपर चढ़ा। उसने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रगड़ा और एक झटके में अंदर घुसा दिया। इतनी जोरदार धक्का था कि मेरी साँस रुक गई। उसने बिना रुके पेलना शुरू कर दिया। बिस्तर चरमरा रहा था। मैं उसके कंधों को पकड़ कर कराह रही थी।

“और जोर से… तोड़ डाल इसे…” मैंने कहा।

तभी दूसरा आदमी मेरे सिर की तरफ आया। उसने अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। अब दो लंड एक साथ काम कर रहे थे। एक चूत में, एक मुँह में। तीसरा आदमी मेरे गांड के पास आ गया। उसने थूक लगाया, उंगली से पहले ढीला किया, फिर धीरे-धीरे अपना लंड मेरी गांड में धकेलने लगा।

तीनों होल भर गए। मुँह में लंड, चूत में लंड, गांड में लंड। मैं बीच में दब कर कराह रही थी। आवाजें निकल रही थी, लेकिन लंड की वजह से साफ नहीं आ रही थी। सिर्फ “उम्मम्म… आआआ…” की आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थी।

उन्होंने पोजीशन बदली। मुझे कुत्ते की तरह कर दिया। एक ने पीछे से मेरी चूत में लंड डाला और जोर-जोर से पेलने लगा। उसके हाथ मेरी कमर पर थे। हर धक्के के साथ मेरी गांड थरथरा रही थी। सामने वाले ने मेरा मुँह पकड़ कर अपना लंड अंदर किया। तीसरे ने मेरे स्तनों को दोनों हाथों से मसलना शुरू कर दिया। निपल्स इतने सख्त हो गए थे कि दर्द होने लगा, लेकिन मजा भी आ रहा था।

“आज इसकी दोनों होल फाड़ दो,” एक ने कहा।

बाकी तीन आदमी इंतजार में खड़े थे। वो अपने लंड हिला-हिला कर देख रहे थे। कभी-कभी कोई आकर मेरे मुँह में लंड डाल देता, फिर हटा लेता।

जब पहला आदमी झड़ने के करीब पहुँचा तो उसने लंड निकाला और मेरे चेहरे पर, स्तनों पर, पेट पर अपना गाढ़ा सफेद माल उड़ेल दिया। गर्म वीर्य मेरे होंठों और आँखों तक पहुँच गया। मैंने जीभ निकाल कर चाटना शुरू कर दिया।

तभी दूसरे ने सीधा मेरी चूत में ही झड़ दिया। गर्म-गर्म वीर्य अंदर फैलते ही मेरे शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। तीसरे ने मेरी गांड से लंड निकाला और मेरी पीठ पर अपना माल छोड़ दिया।
लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था।

उन्होंने मुझे थोड़ा आराम दिया। पानी पिलाया। फिर दोबारा शुरू किया। इस बार दो आदमियों ने मुझे उठा लिया। एक ने नीचे से मेरी चूत में लंड डाला, दूसरे ने ऊपर से गांड में। मैं हवा में झूल रही थी। दोनों लंड एक साथ अंदर-बाहर हो रहे थे। मेरी चूत और गांड दोनों फटने के कगार पर थे। दर्द हो रहा था, लेकिन मजा भी पागलपन के स्तर का था।

“हाँ… ऐसे ही… रंडी बना दो मुझे… और जोर से…” मैं चिल्ला रही थी।

एक-एक करके बाकी आदमियों ने भी बारी-बारी से मेरी चूत, गांड और मुँह इस्तेमाल किया। किसी ने मुँह में झड़ कर पूरा वीर्य पिला दिया। किसी ने स्तनों के बीच लंड रगड़ कर माल गिराया। किसी ने मेरी जाँघों पर। कमरा वीर्य की गंध से भर गया था। मेरा पूरा शरीर चमक रहा था।

रात के लगभग तीन बज गए थे जब आखिरी आदमी ने भी झड़ लिया। मैं बिस्तर पर लेटी थी। चूत और गांड दोनों से सफेद गाढ़ा माल बह रहा था। मुँह के कोनों पर, बालों में, स्तनों पर, पेट पर हर जगह उनके वीर्य के निशान थे। शरीर दर्द कर रहा था, लेकिन मन पहली बार पूरी तरह शांत और संतुष्ट था।

मैंने आँखें बंद करके कहा, “कल फिर आना। अगली बार दस लोग लाना। आज तो बस शुरुआत थी।”

सब हँसे। एक ने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “तू असली रंडी है। ऐसी औरत कम मिलती है।”

मैंने आँखें खोली‌ और मुस्कुरा दी।

“मैं रंडी नहीं। मैं अपनी हवस की मालकिन हूँ।”

सुबह जब सब चले गए तो मैं नहाई। शरीर पर उनके नाखूनों और दाँतों के निशान थे। चूत और गांड अभी भी हल्के सूजे हुए थे। लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी।
मैंने फिर से फोन उठाया और मैसेज किया—

“अगली रात तैयार रहना। इस बार और लंबा खेल होगा।”

मैं बिस्तर पर लेट गई। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में फिर से आग सुलगने लगी थी। बत्तीस साल की उम्र में पहली बार मुझे लगा कि मैं सच में जी रही हूँ।
अब मुझे पता था कि मेरी भूख आसानी से नहीं बुझने वाली।

और मैं बुझाना भी नहीं चाहती थी।

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