मेरा नाम सॅंडी (संदीप) है। पुणे के एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में थर्ड ईयर पढ़ता हूं। पढ़ाई के साथ-साथ थोड़ा-बहुत प्रोजेक्ट्स भी करता हूं। मेरा क्लासमेट राहुल मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। वो थोड़ा शांत स्वभाव का था, लेकिन बहुत मददगार। हम दोनों साथ प्रोजेक्ट करते, कभी-कभी लाइब्रेरी में घंटों बैठ कर पढ़ते। एक दिन उसने मुझे अपने फ्लैट पर डिनर के लिए बुलाया। बोला, “यार सॅंडी, मेरी मम्मी देवगाव से आई हैं। घर का असली महाराष्ट्रीयन खाना खाएंगे। तू भी आ जा, अकेला मत बैठना।”
मैं शाम 7 बजे फ्लैट पर पहुँचा। राहुल अभी ऑफिस से नहीं लौटा था — वो पार्ट-टाइम जॉब करता था। दरवाजा उसकी मम्मी मंगला आंटी ने खोला।
मंगला आंटी को देखते ही मेरा मन एक पल के लिए अटक गया। 45 साल की उम्र थी, लेकिन वो देखने में बहुत यूथफुल लगती थी। गोरा रंग, लंबाई करीब 5 फीट 2 इंच, शरीर थोड़ा भरावदार लेकिन आकर्षक — खास कर उनके भारी, गोल-गोल स्तन जो साड़ी के ब्लाउज में भी साफ उभरे हुए दिख रहे थे।
कमर थोड़ी मोटी, लेकिन गांड गोल और आकर्षक। चेहरा सौम्य, बड़ी-बड़ी आँखें, माथे पर सिंदूर और गले में मंगलसूत्र। उन्होंने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी थी, ब्लाउज थोड़ा टाइट फिटिंग वाला। पूजा करके अभी-अभी निकली लग रही थी — हल्की अगरबत्ती की खुशबू उनके कपड़ों से आ रही थी।
“आओ बेटा सॅंडी… राहुल ने बताया था। अंदर आ जाओ,” उन्होंने नरम, मधुर मुस्कान के साथ कहा। उनकी आवाज में एक प्रकार की गर्माहट थी जो तुरंत दिल छू जाती है।
मैं अंदर गया। फ्लैट छोटा लेकिन साफ-सुथरा था। दीवार पर देवी-देवताओं की तस्वीरें, एक कोने में छोटा मंदिर। आंटी ने मुझे पानी दिया और बोली, “बैठो बेटा। मैं चाय बनाती हूं। राहुल को फोन किया था, वो थोड़ी देर से आएगा।”
हम दोनों किचन के पास वाले सोफे पर बैठ कर बातें करने लगे। आंटी ने पूछा, “तुम कहाँ के हो? घर परिवार सब कैसे हैं?” मैंने बताया कि मैं सोलापुर के पास का हूं, लेकिन पुणे में पढ़ाई के लिए आया हूं। फिर उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में थोड़ा बताया।
“बेटा, राहुल के पापा पिछले 8-10 साल से ज्यादातर बाहर रहते हैं। नौकरी की वजह से। देवगाव में मैं अकेली ही घर संभालती हूं। पूजा-पाठ, मंदिर जाना, कभी-कभी कीर्तन… यही मेरा सहारा है। लेकिन कभी-कभी… बहुत अकेलापन लगता है। राहुल भी यहाँ व्यस्त, पापा दूर… मन उदास हो जाता है।”
उनकी आवाज में एक हल्का दर्द था। मैं चुप-चाप सुन रहा था। उनकी बातों में एक सच्चाई थी जो मुझे छू गई। मैंने कहा, “आंटी, आप इतनी अच्छी हैं। देव भी आपके साथ हैं। लेकिन हाँ, अकेलापन किसी को भी तकलीफ देता है।”
बातें करते-करते समय बीतता गया। आंटी ने मुझे अपनी पुरानी यादें सुनाई — कैसे उन्होंने शादी के बाद सपने देखे थे, लेकिन जिंदगी घर-गृहस्थी में समा गई। मैंने भी अपनी बातें शेयर की — कॉलेज की टेंशन, फ्यूचर की चिंता, कभी-कभी अकेलेपन की बात। हम दोनों के बीच एक अजीब सा कनेक्शन बनने लगा था।
रात 8:30 बजे राहुल का फोन आया। “यार सॅंडी, सॉरी भाई! ऑफिस में बहुत बड़ा इश्यू आ गया है। मुझे रात 11-12 बजे तक लगेगा। तू मम्मी के साथ खाना खा लेना। मैं आऊंगा तो बात करते हैं। मम्मी को बोल देना कि चिंता ना करे।”
अब घर में सिर्फ मैं और मंगला आंटी थे।
आंटी ने खाना तैयार किया — वरन-भात, पुरणपोळी, आमटी… असली घर का स्वाद। खाते वक्त हम और बातें करते रहे। उन्होंने हँसते हुए कहा, “सॅंडी बेटा, तुम बहुत अच्छे लड़के लगते हो। राहुल को भी तुम बहुत पसंद हो।”
खाने के बाद हम सोफे पर बैठकर पुरानी हिंदी फिल्म देखने लगे — एक पुरानी रोमांटिक फिल्म। आंटी ने कहा, “ये फिल्म देख कर पुराने दिन याद आ जाते हैं। उस समय हम भी सपने देखते थे…”
रात 10:30 हो चुकी थी। मैं उठने लगा तो आंटी ने मना किया, “सॅंडी बेटा, इतनी रात को अकेले कैसे जाओगे? राहुल के रूम में सो जाओ। सुबह साथ नाश्ता करेंगे। मैं अकेली भी डरती हूं रात में।”
मैं मान गया। राहुल के बेड पर लेट गया। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मन में आंटी की बातें घूम रही थी — उनकी उदासी, उनकी मुस्कान, उनका सौम्य चेहरा। रात करीब 1:15 बजे मुझे प्यास लगी। मैं उठा और पानी पीने गया। आंटी की बेडरूम का दरवाजा हल्का-सा खुला था। अंदर हल्की नाइट लैंप की पीली रोशनी थी। मैंने झाँका तो मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।
मंगला आंटी बेड पर लेटी थी। उनकी साड़ी कमर तक ऊपर सरक गई थी। पेटीकोट और नीली पैंटी थोड़ी नीचे खिसकी हुई थी। एक हाथ अपनी योनी पर था — धीरे-धीरे उंगलियां चला रही थी। दूसरा हाथ ब्लाउज के अंदर था, स्तन को दबा रही थी। उनकी सांसें तेज थी, होंठ हल्के-हल्के कांप रहे थे। आँखें बंद थी और मुंह से बहुत हल्की “आह… आह… हां… बस…” की आवाजें आ रही थी।
मैं चुप-चाप 2-3 मिनट तक देखता रहा। मेरा लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। उनकी योनी की हल्की चमक और उनके स्तनों की हरकत देख कर मेरा मन विचलित हो गया। फिर मैं शांतिपूर्वक वापस अपने रूम में चला गया। लेकिन नींद तो पूरी तरह उड़ गई थी। मैं सोच रहा था — इतनी सुंदर, भक्तिमय आंटी भी अंदर से कितनी अकेली हैं।
सुबह 6:30 बजे जब मैं उठा तो आंटी पूजा कर रही थी। पूजा की थाली में फूल, अगरबत्ती, घंटी की आवाज… वो इतनी खोई हुई थी कि मुझे देखा भी नहीं। पूजा खत्म होने के बाद उन्होंने मुझे चाय दी। उनके चेहरे पर हल्की शर्म और थकान थी।
मैंने चाय का कप हाथ में लिया और हिम्मत जुटा कर सीधे कहा, “आंटी, रात को मैंने आपको देख लिया था।”
उनका चेहरा तुरंत लाल हो गया। हाथ कांपने लगे। उन्होंने कप नीचे रख दिया और आँखें झुका ली। “सॅंडी… मैं… बहुत शर्मिंदगी हो रही है बेटा… मैं अकेली हूं ना… बहुत दिनों से… कोई नहीं… कभी-कभी मन काबू में नहीं रहता…”
उनकी आँखों में आंसू आ गए। मैं उनके पास बैठ गया और धीरे से उनका हाथ थाम लिया। “आंटी, शर्माने की कोई बात नहीं। आप बहुत सुंदर औरत हो। अकेलापन किसी को भी तोड़ देता है। मैं समझता हूं। अगर आप चाहो… तो मैं आपकी मदद कर सकता हूं। बिना किसी को बताए। सिर्फ आप और मैं।”
मंगला आंटी काफी देर तक चुप रही। उनकी सांसें तेज हो रही थी। फिर उन्होंने बहुत धीरे से कहा, “बेटा… ये गलत है… मैं राहुल की माँ हूं… तुम उसके दोस्त हो… लेकिन… सच कहूं तो बहुत दिनों से किसी ने मुझे इस तरह छुआ भी नहीं… प्यार से बात भी नहीं की…”
मैंने उन्हें हल्के से गले लगा लिया। उनका शरीर थरथरा रहा था। मैंने उनका चेहरा ऊपर किया और बहुत धीरे, बहुत प्यार से उनके होठों पर किस्स किया। उन्होंने विरोध नहीं किया। बस आँखें बंद कर ली और हल्का सा कांप उठी।
किस शुरू में हल्का था, लेकिन धीरे-धीरे गहरा होता गया। मैंने उनका ब्लाउज खोलना शुरू किया — एक-एक हुक… उनके भारी, गोरे स्तन ब्रा में दबे हुए थे। ब्रा का हुक खोलते ही दोनों स्तन बाहर आ गए — बड़े, नरम, हल्के लटके हुए लेकिन निप्पल्स सख्त हो चुके थे। मैंने एक स्तन को दोनों हाथों से दबाया और निप्पल मुंह में ले लिया। धीरे-धीरे चूसने लगा, जीभ से घुमाने लगा।
“उफ्फ… सॅंडी… आह्ह्ह… कितने साल बाद किसी ने… हां… धीरे चूसो बेटा… आह्ह्ह…” उनकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसमें दर्द के साथ सुख भी था।
मैंने उन्हें बेडरूम में ले जाकर लिटा दिया। उनकी साड़ी का पल्लू हटाया, पेटीकोट और पैंटी धीरे-धीरे उतारी। उनकी योनी गोरी, थोड़ी काली बालों वाली और पहले से ही गीली चमक रही थी। मैंने अपना मुंह वहाँ लगाया और बहुत प्यार से चाटना शुरू किया — ऊपर-नीचे, क्लिटोरिस पर जीभ घुमा कर, अंदर हल्के से डाल कर।
मंगला आंटी के हाथ मेरे बालों में फंस गए। “आआह्ह्ह… सॅंडी बेटा… वहाँ… हां… चाटो… मेरी चूत को चाटो… आह्ह्ह… बहुत अच्छा लग रहा है… कितने दिनों बाद…”
उनका शरीर धीरे-धीरे तनता गया। पैर कांप रहे थे। कुछ मिनट बाद उन्होंने पहला जोरदार ऑर्गेज्म लिया — शरीर जोर से कांप उठा, योनी से काफी गर्म रस निकला और मेरे मुंह में आ गया। उन्होंने मोठ्याने सिसकारी भरी — “आह्ह्ह… देवा…”
फिर मैंने अपनी पैंट उतारी। मेरा 7 इंच का मोटा, सख्त लंड बाहर आया। आंटी ने उसे देखा तो उनकी आँखें फैल गई। “इतना बड़ा… डर लग रहा है सॅंडी… बहुत दिनों बाद है…”
मैंने उनके पैर धीरे से फैलाए, लंड की टिप उनकी गीली योनी पर रखी और बहुत हल्के दबाव से अंदर डालना शुरू किया।
“आह्ह्ह… धीरे… सॅंडी… आह्ह्ह… पूरा मत डालो अभी… हल्के से…”
धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर चला गया। दोनों एक पल रुके। फिर मैंने बहुत धीमी गति से हिलाना शुरू किया। मंगला आंटी की आँखें बंद थी, मुंह से लगातार मीठी-मीठी सिसकारियां निकल रही थी — “हां… हां… और अंदर… आह्ह्ह… बहुत अच्छा… तुम बहुत प्यारे हो बेटा…”
धीरे-धीरे मेरी स्पीड बढ़ी। अब हम दोनों एक-दूसरे को कस कर पकड़े हुए थे। उनके बड़े स्तन मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। कमरे में सिर्फ हमारे श्वास, “पच… पच…” की हल्की आवाजें और उनकी सिसकारियां थी।
“सॅंडी… जोर से… अब जोर से चोदो… मेरी चूत को फाड़ दो… आह्ह्ह… हां… बहुत सालों बाद…”
अंत में जब मैं झड़ने वाला था, आंटी ने मुझे और कस कर जकड़ लिया। “अंदर ही… अंदर डाल दो बेटा… भर दो मुझे… मैं तुम्हारी हूं आज…”
मैंने उनकी गर्म चूत के अंदर ही सारी गर्म मलाई छोड़ दी। दोनों पसीने से तर-बतर होकर एक-दूसरे से लिपटे लेटे रहे। मंगला आंटी ने मेरे कान में फुसफुसाया, “सॅंडी… आज बहुत सालों बाद मैं औरत महसूस की… लेकिन ये राज सिर्फ हमारे बीच रहेगा। राहुल को कभी मत बताना।”
मैंने सिर हिलाया और उन्हें प्यार से चूम लिया। “हाँ आंटी। जब भी आप अकेली होंगी… मैं आपके पास आऊंगा।”
ये सिर्फ शुरुआत थी।
अगले कुछ हफ्तों में राहुल की ऑफिस की ड्यूटी और बढ़ गई। वो अक्सर लेट आता या कभी-कभी आउट ऑफ स्टेशन चला जाता। मंगला आंटी और मैं धीरे-धीरे और करीब आते गए। कभी-कभी वो मुझे फोन करके बुलातीं — “सॅंडी बेटा, आज राहुल नहीं आएगा… तुम आओगे क्या? अकेली बहुत बोर हो रही हूं।”
मैं जाता। कभी हम सिर्फ बातें करते — उनकी जिंदगी, मेरी पढ़ाई, भावनाएं। कभी वो मुझे अपनी पुरानी फोटोज दिखाती — जब वो युवा थी। फिर बातें गर्म हो जाती।
एक दिन शाम को जब मैं गया तो आंटी ने मुझे गले लगाया और रो पड़ीं। “सॅंडी, तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी में रंग आ गया है। लेकिन मैं डरती हूं… ये गलत तो है ना?”
मैंने उन्हें आश्वासन दिया, “आंटी, जो हम दोनों खुश हैं, वो गलत नहीं हो सकता।”
उस रात हमने फिर से प्यार किया — इस बार और लंबा, और इंटेंस। उन्होंने खुद मुझे ऊपर बिठाया और सवार होकर धीरे-धीरे हिलने लगी। उनके बड़े स्तन मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे। मैं उन्हें चूसता रहा। आंटी की सिसकारियां पूरे कमरे में गूंज रही थी।
धीरे-धीरे हमारे रिश्ते में गहराई आती गई। कभी-कभी भावनात्मक बातें, कभी रात भर जाग कर प्यार, कभी हल्के-फुल्के फ्लर्ट। लेकिन राहुल को कभी शक नहीं हुआ। वो हमें बस अच्छे दोस्त समझता था।
मंगला आंटी अब ज्यादा खुश लगती थी। उनकी मुस्कान लौट आई थी। वो कहती, “सॅंडी, तुमने मुझे नई जिंदगी दी है।”
ये रिश्ता अभी भी चल रहा है… धीरे-धीरे, गुप्त रूप से, लेकिन बहुत प्यार और इच्छा से भरा हुआ।
मैंने यहाँ अपने कॉन्टैक्ट डिटेल्स शेयर किए हैं। कुछ लोगों को मेल करना थोड़ा अजीब लगता है। कई लोगों के मन में ये सवाल आता है कि “कहीं कोई जान-पहचान वाला तो नहीं होगा?” — तो इसकी बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए। आपकी हर बात पूरी तरह से प्राइवेट रहेगी।
आप बेझिझक मैसेज कर सकते हैं — चाहे बस बातें करनी हों या कुछ शेयर करना हो। मुझे भी लोगों से बात करना अच्छा लगता है।