पिछला भाग पढ़े:- गांव के लड़कों ने छोटी बहन काव्या को अपने जाल में फंसाया-7
आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा। आगे की कहानी पढ़िए-
शाम का धुंधलका छाते ही काव्या ने अपनी तैयारी शुरू कर दी। उसने आज गहरा काजल लगाया और आईने में अपनी गदराई हुई देह को निहारते हुए एक तंग सलवार-कमीज पहनी, जो उसके अंगों को और भी उभार रही थी। वह जानती थी कि आज खेत में सिर्फ पुराने शिकारी नहीं, बल्कि दो जवान मर्द भी उसका इंतज़ार कर रहे होंगे।
काव्या मटकती हुई खेत के उसी घने कोने में पहुँची। वहाँ लाखन और मोहन पहले से ही घात लगाए बैठे थे। तभी झाड़ियों में कुछ सरसराहट हुई और आर्यन और विक्की दबे पाँव बाहर निकल आए। लाखन और मोहन ने उन्हें देख कर अपनी लाठियां उठाई, पर काव्या ने आगे बढ़ कर उन्हें रोक दिया।
काव्या: “अरे चाचा, रुकिए! ये बेचारे कब से छत पर खड़े-खड़े अपना हाथ थका रहे हैं। आज इन्हें भी अपनी जवानी का थोड़ा दान दे ही देती हूँ।”
काव्या की इस बेबाकी ने सब को सन्न कर दिया। आर्यन और विक्की, जो पहले डरे हुए थे, काव्या की खुली दावत देख कर मदहोश हो गए। खेल अब एक नए स्तर पर पहुँच चुका था। चारों मर्दों ने मिल कर काव्या को बीच में घेरा। काव्या ने खुद अपनी कमीज उतार दी और अधनंगी हालत में उनके बीच खड़ी हो गई।
आर्यन ने काव्या को अपनी गोद में उठाया और विक्की ने उसके टाइट चूचों को चूसना शुरू किया। काव्या की चूचियां अब पत्थर जैसी कड़ी हो चुकी थी। लाखन ने पीछे से आकर काव्या की भारी गांड को अपने दोनों हाथों से फैलाया। उसकी गांड का गोरापन अंधेरे में भी चमक रहा था।
उसने बिना किसी रहम के अपनी पूरी ताकत से पीछे से वार किया। ‘फट… फट… पट-पट-पट!’ काव्या की आवाज़ अब एक अलग ही लय में निकलने लगी। जब लाखन पीछे से उसे ठोक रहा था, तब आर्यन ने उसे आगे से थाम रखा था और विक्की उसकी गर्दन और कंधों को काट रहा था। मोहन ने देखा कि काव्या अब पूरी तरह से गर्म हो चुकी है, तो उसने आर्यन से उसे छीन लिया और उसे ज़मीन पर औंधे मुंह लेटा दिया। अब चारों बारी-बारी से उस पर पिल पड़े।
जब जवान आर्यन ने अपनी पूरी ऊर्जा के साथ काव्या की गांड में झटके मारना शुरू किए, तो उसका मांसल पिछवाड़ा थर-थर-थर-थर बिजली की तरह कांपने लगा। ‘थप-थप-थप’ की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि दूर तक सुनाई दे रही थी। एक तरफ से आर्यन उसकी गांड मार रहा था, तो दूसरी तरफ से विक्की ने उसकी चूत में अपना लंड उतार दिया। काव्या दो जवान लंडों के बीच किसी रबर की तरह खिंच रही थी।
विक्की: “अरे भाई आर्यन, ये गांड है या मलाई? साला लंड अंदर जाते ही ऐसा लगता है जैसे किसी जन्नत में आ गए हों!”
पूरा खेत अब कराहों और टकराने की आवाज़ों से भर गया था। काव्या अब एक साथ चार-चार लंडों का स्वाद चख रही थी। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और वह बस उस दर्द और मजे के सैलाब में डूबी हुई थी। अंत में, चारों मर्दों ने एक-एक करके अपना सारा लावा काव्या के ऊपर, उसके मुँह में और उसके जिस्म की गहराइयों में उड़ेल दिया।
काव्या पसीने, लार और वीर्य से पूरी तरह तरबतर हो चुकी थी। वह सरसों के पीले फूलों के बीच एक ऐसी रानी की तरह लेटी थी, जिसने पूरे गाँव की मर्दानगी को अपनी जवानी के नीचे कुचल दिया था। अब वह सिर्फ एक लड़की नहीं, बल्कि उस गाँव की सबसे बड़ी हवस की मल्लिका बन चुकी थी।
राजू को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि उसके अपने ही घर की दीवारों के पीछे उसकी बहन की जवानी का ऐसा नंगा नाच चल रहा था। उस रात पूरा परिवार रिश्तेदारी में एक शादी में गया हुआ था, और घर की रखवाली का जिम्मा काव्या और राजू पर था। लेकिन राजू भी देर रात दोस्तों के साथ बाहर रुकने का बहाना करके निकला था, पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
इधर घर खाली पाकर आर्यन और विक्की दबे पांव काव्या के कमरे में घुस गए थे। काव्या, जो अब पूरी तरह से इस खेल की आदी हो चुकी थी, ने लाल पारदर्शी साड़ी पहनी हुई थी। जैसे ही वे दोनों अंदर आए, काव्या ने बिना देर किए अपनी साड़ी के पल्लू को सरका दिया।
आर्यन ने काव्या को पलंग के कोने पर टिकाया और उसकी भारी गांड को ऊपर उठाकर अपनी जांघों पर सैट किया। विक्की सामने खड़ा होकर अपने लंड को काव्या के मुँह में रगड़ रहा था। ‘फट… फट… पट-पट-पट!’ आर्यन के झटके इतने जोरदार थे कि पलंग की लकड़ियां चूँ-चूँ करने लगी। काव्या की गांड हर प्रहार के साथ थर-थर-थर-थर कांप रही थी और थप्पड़ों की आवाज़ ‘थप-थप-थप-थप’ कमरे की दीवारों से टकरा कर गूँज रही थी।
आर्यन: “विक्की भाई, आज तो घर का बिस्तर है, आज तो इसकी चूत और गांड के परखच्चे उड़ा देंगे!”
तभी अचानक नीचे के मुख्य दरवाजे के खुलने की आवाज़ आई। राजू का दोस्तों के साथ प्लान कैंसिल हो गया था और वह चुप-चाप घर लौट आया था। जैसे ही वह सीढ़ियों के पास पहुँचा, उसे ऊपर के कमरे से अजीब सी सिसकियों और टकराने की आवाज़ें सुनाई दी।
उसका माथा ठनका। वह दबे पांव ऊपर बढ़ा और जैसे ही उसने काव्या के कमरे का आधा खुला दरवाजा पूरी तरह से धक्का देकर खोला, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। सामने का मंजर किसी डरावने सपने जैसा था। उसकी सगी बहन काव्या, नग्न अवस्था में पलंग पर झुकी हुई थी। आर्यन पीछे से उसकी गांड मार रहा था और विक्की का लंड काव्या के मुँह के अंदर था। काव्या की आँखें नशे और मजे में बंद थी, और वह बेतहाशा अपनी कमर हिला रही थी।
राजू (गले में घोंटती हुई आवाज़ के साथ): “काव्या…!! ये… ये सब क्या हो रहा है?”
राजू की आवाज़ सुनते ही जैसे कमरे में बिजली गिर गई। आर्यन और विक्की झटके से अलग हुए, उनके लंड अब भी तनाव में थे और उन पर काव्या की जवानी का रस लगा हुआ था। काव्या ने जैसे ही अपने भाई को सामने देखा, उसकी रूह कांप गई, पर वह इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उसने अपनी नग्नता को ढकने की कोशिश तक नहीं की।
राजू गुस्से से लाल होकर आगे बढ़ा और आर्यन का कॉलर पकड़ लिया। “सालों! मेरे घर में घुस कर मेरी बहन के साथ ये गंदा काम… मैं तुम दोनों को जान से मार दूंगा!”
लेकिन तभी विक्की ने एक शातिर मुस्कान के साथ राजू को रोका। “अरे राजू भाई, गुस्सा क्यों कर रहे हो? अपनी बहन से तो पूछो, इसे चाचाओं ने पहले ही चख लिया है। हम तो बस हाथ बंटा रहे थे। और अगर तुम चिल्लाओगे, तो पूरे गाँव को पता चल जाएगा कि तुम्हारी बहन कितनी बड़ी रंडी है।”
राजू सन्न रह गया। उसकी नज़र काव्या पर पड़ी, जो अब निर्लज्जता से अपने बाल ठीक कर रही थी। काव्या ने अपनी नशीली आँखों से राजू को देखा और बोली—
काव्या: “भैया, अब तो जो होना था हो गया। या तो आप हमें मार दो, या फिर आप भी इस जवानी का हिस्सा बन जाओ और इस राज को राज ही रहने दो।”
राजू के दिमाग में धमाका हुआ। अपनी बहन की गदराई हुई देह और उन लड़कों की बातें सुनकर उसके भीतर का भाई मर गया और एक प्यासा मर्द जाग उठा। कमरे का सन्नाटा अब एक और गहरे और खौफनाक खेल की गवाही देने वाला था।
राजू की आँखों में खून उतर आया था। बहन की बेशर्मी ने उसके दिमाग की नसें हिला दी थी। वह गुस्सा तो था, लेकिन उस गुस्से में एक अजीब सी वहशी दरिंदगी घुल चुकी थी। उसने विक्की और आर्यन की ओर देखा और फिर काव्या की उस मखमली देह की ओर, जो अब भी पसीने से चमक रही थी।
राजू: “सबक? हाँ, इसे ऐसा सबक सिखाऊंगा कि ये ताउम्र याद रखेगी कि अपने भाई की नाक कटवाने का अंजाम क्या होता है।”
राजू ने झटपट अपना फोन निकाला और अपने तीन और जिगरी दोस्तों— कालिया, मोनू और शेरा को मैसेज कर दिया। “जल्दी मेरे घर आ जाओ, आज एक ऐसी चीज़ खिलाऊंगा जो तुमने सपने में भी नहीं सोची। 10 मिनट के भीतर वे तीनों भी कमरे में दाखिल हो गए। कमरे का नजारा देख कर उनकी लार टपकने लगी। काव्या अब एक पलंग पर अकेली थी और उसके सामने छह भूखे भेड़िए खड़े थे।
राजू: “सुनो भाइयों, ये मेरी रंडी है। इसने गाँव के चाचाओं से लेकर इन लड़कों तक सबको अपनी चूत पर नचाया है। आज हम सब मिलकर इसकी वो हालत करेंगे कि ये हफ्तों तक खड़ी ना हो पाए!”
राजू ने सबसे पहले आगे बढ़ कर काव्या के बाल पकड़े और उसे घसीट कर फर्श पर पटक दिया। उसने अपना बेल्ट खोला और काव्या की नंगी पीठ पर एक ज़ोरदार वार किया।
‘चटाक…!’
काव्या: “आह्ह्ह्ह… भैया…!”
राजू: “चुप रह! आज तो सिर्फ सज़ा मिलेगी।”
राजू ने इशारा किया और उन पाँचों ने काव्या को घेर लिया। सज़ा अब धीरे-धीरे राजू ने काव्या को अपनी जांघों के बीच दबाया और बिना किसी रहम के अपना लंड उसकी गांड के छेद पर टिकाया। उसने गुस्से में ऐसा झटका मारा कि काव्या की चीख छत फाड़ गई। कालिया और मोनू ने काव्या के दोनों हाथों को फैला कर पकड़ लिया, जबकि शेरा ने उसके मुँह में अपना लंड ठूंस दिया ताकि उसकी आवाज़ बाहर ना जाए।
आर्यन और विक्की उसकी जांघों को मसल रहे थे। ‘फट… फट… थप-थप-थप-थप!’ कमरे में अब सिर्फ देह से देह टकराने की आवाज़ें गूँज रही थी। राजू उसे सबक सिखाने के नाम पर अपनी पूरी ताकत से उसकी गांड मार रहा था। जब राजू ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई, तो काव्या की भारी गांड थर-थर-थर-थर कांपने लगी। हर धक्के पर उसका पूरा बदन आगे-पीछे डोल रहा था।
जब राजू हटा, तो कालिया ने उसकी जगह ली, फिर मोनू ने। काव्या अब एक ऐसी मशीन बन चुकी थी जिसे छह मर्द बारी-बारी से रौंद रहे थे। राजू पास खड़ा होकर अपनी बहन की दुर्गति देख रहा था। उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान थी। काव्या की आँखें अब आंसुओं से भरी थी, उसका जिस्म नीला पड़ चुका था, लेकिन उन मर्दों की हवस शांत होने का नाम नहीं ले रही थी।
राजू: “देख ले काव्या, ये तेरे उन चाचाओं से भी खतरनाक हैं। आज की रात तेरे जिस्म का हर कतरा हमारा है।”
कमरे में ‘चट-चट’ और ‘पट-पट’ की आवाज़ों के बीच काव्या की रूह छटपटा रही थी, लेकिन उसका भाई अब खुद इस तबाही का सेनापति बन चुका था। रात अभी जवान थी और छह मर्दों की प्यास बुझनी अभी बाकी थी। उस रात राजू के घर में बहन के मान-मर्यादा की जो चिता जली, उसकी आंच पूरे गाँव को हिलाने वाली थी। कमरे के भीतर अब मर्यादा की सारी दीवारें गिर चुकी थी। राजू के दोस्त—कालिया, मोनू और शेरा—किसी भूखे जानवर की तरह काव्या के जिस्म पर टूट पड़े थे। राजू किनारे खड़ा होकर अपनी बहन की बर्बादी देख रहा था, जैसे वह उसे उसकी “आज़ादी” की कीमत चुकाने पर मजबूर कर रहा हो।
कालिया ने काव्या को ज़मीन पर औंधे मुंह लेटा दिया और उसकी भारी गांड को ऊपर उठा दिया। उसने अपनी पूरी ताकत से जब पहला झटका मारा, तो काव्या का चेहरा फर्श से जा टकराया। कालिया की रफ़्तार किसी मशीन जैसी थी। हर प्रहार के साथ काव्या की गांड ‘फट-फट-फट-फट’ की आवाज़ के साथ उछल रही थी।
काव्या का पूरा निचला हिस्सा थर-थर-थर-थर कांप रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सज़ा है या मौत का मंजर। जैसे ही कालिया हटा, शेरा ने उसकी जगह ली। उसने काव्या की जांघों को इतनी ज़ोर से भींचा कि वहाँ उंगलियों के नीले निशान पड़ गए। वह उसे किसी रबर की गुड़िया की तरह पटक-पटक कर चोद रहा था। मोनू और बाकी लड़के भी पीछे नहीं रहे। वे काव्या के शरीर के हर हिस्से को अपनी हवस से रौंद रहे थे। ‘थप-थप-थप’ का शोर कमरे की दीवारों में दफन होकर रह गया था। काव्या की सिसकियाँ अब सिर्फ एक कराह बनकर रह गई थी।
करीब दो घंटे तक चले इस खौफनाक खेल के बाद, जब काव्या का शरीर पूरी तरह से निढाल होकर फर्श पर बेजान पड़ा था, तब जाकर उन दरिंदों की प्यास शांत हुई। कमरे में पसीने, लार और वीर्य की गंध फैल चुकी थी। राजू के दोस्त हांफते हुए अपने कपड़े ठीक करने लगे। उनके चेहरों पर एक शैतानी संतुष्टि थी।
कालिया (राजू के कंधे पर हाथ रखते हुए): “वाह राजू भाई! सच में मान गए तुम्हें। ऐसी मखमली और गदराई जवानी तो हमने आज तक नहीं चखी थी। आज तो तुमने हमें जन्नत दिखा दी।”
शेरा: “हाँ भाई, राजू। तेरी बहन की गांड का जो टेक्सचर है ना, वैसा स्वाद पूरे इलाके में कहीं नहीं मिलेगा। इस पार्टी के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया यार। तूने सच में दिल खुश कर दिया।”
मोनू (काव्या की ओर एक हिकारत भरी नज़र डालते हुए): “राजू भाई, ऐसी चीज़ रोज़-रोज़ नहीं मिलती। जब भी इसका ‘सबक’ सिखाने का मन हो, हमें याद कर लेना।”
राजू ने एक सूखी मुस्कान के साथ अपने दोस्तों से हाथ मिलाया। उन सब ने राजू की पीठ थपथपाई और एक-एक करके कमरे से बाहर निकल गए, जाते-जाते वे काव्या की उस बिखरी हुई जवानी को फिर से चखने के वादे कर रहे थे।
कमरे में अब सिर्फ राजू और फर्श पर पड़ी काव्या थी। राजू ने अपनी बहन की ओर देखा, जिसकी आँखों से अब आंसू भी सूख चुके थे। उसने एक गहरी सांस ली और बोला, “देख लिया काव्या? ये तेरे उन चाचाओं से कहीं ज्यादा खतरनाक थे। अब तू राजू की बहन नहीं, हम सब की जागीर है।”
उस रात का अंत एक ऐसी खामोशी के साथ हुआ, जिसने काव्या के वजूद को हमेशा के लिए बदल दिया। वह अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उन छह मर्दों की वासना का एक “मैदान” बन चुकी थी।
राजू के पैरों तले जमीन तब खिसक गई जब उसके दोस्त कालिया, मोनू और शेरा बाहर जाने के बाद बरामदे में आपस में हंसते हुए अपनी जीत का जश्न मना रहे थे। उनकी बातों से एक ऐसा सच निकल कर आया जिसने राजू की रूह कंपा दी।
आखिर क्या बात थी जानने के लिए बने रहें अपने भाई राजू के साथ।