पिछला भाग पढ़े:- छोटी बहन सपना की बम्पर चुदाई अलग-अलग लंड से-4
आशा है आपने पिछली कहानी को पढ़ लिया होगा। आगे की कहानी-
मेरठ की यादें और ट्रेन के सफर का वह कूपे वाला किस्सा अब बीते दिनों की बात हो चुके थे। सपना अब पूरी तरह से गाँव के रंग-ढंग में ढल चुकी थी। शहर से लौटने के बाद उसका रूप और भी निखर गया था; उसका गोरा रंग, 5 फीट 7 इंच का भारी-भरकम शरीर और 32-30-32 का वह कातिलाना फिगर गाँव के साधारण सूती कपड़ों में भी इस कदर कहर ढाता था कि खेतों की तरफ से गुजरते वक्त अच्छे-अच्छे बुजुर्ग भी अपनी नज़रें नहीं हटा पाते थे।
यह नया किस्सा नवंबर के महीने का है, जब गाँव में कड़ाके की ठंड की शुरुआत हो रही थी और खेतों में गन्ने की कटाई और पिराई का काम जोरों पर था। हमारे खेतों के एक कोने में पुराना कोल्हू (क्रशर) लगा हुआ था, जहाँ गन्ने का रस निकाल कर गुड़ बनाया जाता था।
उस दिन दोपहर के करीब एक बज रहे थे। कोल्हू पर काम करने वाले मजदूर खाना खाने और आराम करने के लिए अपने-अपने घरों को जा चुके थे। चारों तरफ सन्नाटा था। धूप खिली हुई थी, लेकिन गन्ने के ऊंचे-ऊंचे खेतों और कोल्हू के पास बनी फूस की झोपड़ी के अंदर एक अजीब सी ठंडक और एकांत था।
मैं कोल्हू के पास लकड़ी के तख्त पर लेटा हुआ था कि तभी दूर पगडंडी से सपना आती हुई दिखाई दी। उसने उस दिन हल्के हरे रंग का टाइट सलवार-सूट पहन रखा था। धूप की वजह से उसका गोरा चेहरा एक-दम गुलाबी हो रहा था। बिना ब्रा के उसके पपीते जैसे कड़े बूब्स कुर्ते के सामने वाले हिस्से को पूरी तरह से तान रहे थे, और हर कदम के साथ उसकी भारी, कद्दू जैसी गांड पीछे से मटक रही थी।
वह अपने हाथ में एक स्टील के टिफिन में मेरे लिए दोपहर का खाना लेकर आई थी।
“भैया, आप अभी तक भूखे बैठे हो? सब मजदूर तो चले गए,” उसने झोपड़ी के अंदर आते हुए टिफिन तख्त पर रख दिया।
मैंने उठ कर उसका हाथ पकड़ा और उसे अपनी तरफ खींच लिया। वह सीधे मेरी गोद में आकर गिरी, जिससे उसके भारी बूब्स मेरे सीने से जोर से टकराए। पैंट के अंदर मेरे 8 इंच के कड़े लंड ने तुरंत अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी।
मैंने उसके कान के पास फुसफुसा कर कहा, “मजदूरों के जाने का ही तो इंतजार कर रहा था सपना। इस भरी दोपहर में, गन्ने के इन खेतों के बीच तुझे चोदने की जो तलब उठी है, वह इस खाने से शांत नहीं होने वाली।”
सपना ने शर्माते हुए चारों तरफ देखा और मुस्कुराकर बोली, “आप भी न भैया… यहाँ खुले में कोई आ गया तो? वैसे, कोल्हू के पीछे जो गन्ने की सूखी पत्तियों (पत्ताल) का ढेर है, वहाँ कोई नहीं देख पाएगा।”
सपना की बात सुनते ही मेरी कामवासना सातवें आसमान पर पहुँच गई। मैं उसे हाथ पकड़कर झोपड़ी के उस कोने में ले गया जहाँ गन्ने की सूखी और मुलायम पत्तियों का एक बड़ा सा ढेर लगा हुआ था। वह जगह इतनी सुरक्षित थी कि बाहर से कोई चाह कर भी अंदर का नजारा नहीं देख सकता था।
मैंने बिना कोई वक्त गंवाए उसके हरे कुर्ते को नीचे से पकड़ा और ऊपर की तरफ खींच दिया। सपना ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और कुर्ता उसके सिर से बाहर आ गया। कुर्ता हटते ही उसका गोरा, मखमली बदन मोमबत्ती जैसी खिली धूप में चमक उठा। बिना ब्रा के उसके 32″ के सुडौल और कड़े बूब्स पूरी तरह आज़ाद हो गए, जिनके भूरे निप्पल उत्तेजना के मारे एक-दम कड़े हो चुके थे।
मैंने तुरंत आगे बढ़ कर उसके निप्पल्स को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें बेरहमी से चूसने लगा। सपना ने अपनी आँखें मूंद ली और मेरी पीठ को अपने हाथों से भींचते हुए सिसकने लगी, “आहहह… भैया… हाँ, वैसे ही… आज बहुत दिनों बाद गाँव की इस मिट्टी पर मज़ा आएगा।”
मैंने नीचे झुक कर उसकी सलवार का नाड़ा खोला और सलवार के साथ उसकी सफेद पैंटी को भी एक झटके में उसकी लंबी, गोरी जांघों से बाहर निकाल दिया। अब सपना गन्ने की उन पत्तियों के ढेर पर पूरी तरह निर्वस्त्र होकर चित लेटी थी। उसकी जांघों के बीच की गुलाबी बुर से काम-रस बह कर पत्तियों पर टपकने लगा था।
मैंने अपनी पैंट उतारी और मेरा 8 इंच लंबा और मोटा लंड कड़ा होकर हवा में सलामी देने लगा। सपना ने अपनी दोनों टांगों को पूरी तरह फैला दिया और अपनी कद्दू जैसी गांड को थोड़ा ऊपर उठाया ताकि लंड आसानी से अंदर जा सके। उसने खुद अपने हाथों से मेरे लंड को पकड़ा और अपनी चूत के मुहाने पर सेट कर दिया।
मैंने उसकी पतली कमर को अपनी मजबूत हथेलियों में जकड़ा और एक ही जोरदार, गहरे धक्के से अपना पूरा लंड उसकी चूत की गहराई में उतार दिया।
‘पकाक-सड़सड़-फच’ की एक रसीली और जोरदार आवाज उस शांत झोपड़ी में गूंज उठी।
“उई मां! भैया… आह… पूरा पेट तक घुस गया…” सपना के मुंह से एक तीखी चीख निकली, लेकिन उसने तुरंत अपने सूट के दुपट्टे को मुंह में दबा लिया।
मैंने बिना रुके अपनी रफ्तार बढ़ानी शुरू की। दोपहर के उस सन्नाटे में अब सिर्फ ‘फच-फच-फच’, ‘चट-चट-चट’ और ‘फट-फट’ की तेज आवाजें गूंज रही थी। जब भी मेरी जांघें उसकी भारी गांड से टकराती, थप्पड़ जैसी तेज आवाज आती। गन्ने के रस की मीठी खुशबू और चुदाई की गर्मी से हम दोनों के बदन पसीने से लथ-पथ हो चुके थे।
मैंने सपना को घुमा कर घुटनों के बल ला दिया और उसे घोड़ी बना दिया। पीछे से उसकी चौड़ी, कद्दू जैसी गांड का नजारा अद्भुत था। मैंने पीछे से अपना लंड उसकी चूत में सेट किया और दोबारा धक्के मारना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसके पपीते जैसे बूब्स नीचे की तरफ जोर-जोर से बाउंस कर रहे थे।
करीब 25 मिनट की इस नॉन-स्टॉप और जोरदार चुदाई के बाद सपना का पूरा बदन झटके लेने लगा और उसकी चूत ने अपना सारा पानी छोड़ दिया। उसके तुरंत बाद, मैंने भी दो-तीन आखिरी और बेहद गहरे धक्के मारे और अपना सारा गर्म वीर्य उसकी चूत के अंदर गहराई में खाली कर दिया।
हम दोनों पूरी तरह थक कर गन्ने की उन सूखी पत्तियों के ढेर पर एक-दूसरे से लिपटकर लेट गए। थोड़ी देर बाद हमने कोल्हू के पास लगे हैंडपंप के ठंडे पानी से खुद को साफ किया, कपड़े पहने और सपना वापस घर की तरफ निकल गई, जबकि मैं वहीं मजदूरों के आने का इंतजार करने लगा।
गाँव के इन खेतों और कोल्हू के पीछे का यह नया किस्सा हमारी इस अंतहीन यात्रा का एक और रसीला पन्ना होने वाला था, कि कोल्हू के पीछे हमारी चुदाई का तीसरा गवाह रामू की एंट्री हो जाती है।
गन्ने की उन सूखी पत्तियों के ढेर पर जब हमारी चुदाई अपने अंतिम पड़ाव पर थी और ‘फच-फच’ की आवाजें झोपड़ी के सन्नाटे को चीर रही थी, तब हम दोनों अपनी ही दुनिया में पूरी तरह खोए हुए थे। हवस और मजे के उस अंधेपन में हम यह भूल गए थे कि दोपहर का आराम खत्म होने का वक्त हो चुका था।
कोल्हू पर काम करने वाला एक जवान और तगड़ा मजदूर, जिसका नाम रामू था, तय समय से थोड़ा पहले ही खेतों की तरफ लौट आया था। झोपड़ी के अंदर से आती अजीब आवाजों और थप्पड़ जैसी ‘चट-चट’ की थापों को सुन कर उसके कदम वहीं ठिठक गए। उसने जब फूस की दरार से अंदर झांका, तो सपना का नग्न छरहरा बदन और उसकी भारी गांड पर पड़ते मेरे धक्के देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।
रामू गाँव का एक गठीला और गदराया हुआ 24 साल का कसरती लौंडा था, जिसका लंड ऐसे गदराए बदन को देखने के लिए हमेशा तरसता था। वह बिना कोई आवाज किए बाहर ही खड़ा रहा और अपनी फटी हुई तहमत (लुंगी) के ऊपर से ही अपने मूसल जैसे लंड को सहलाने लगा।
रंगे हाथों पकड़ना और रामू की कटीली शर्त-
जैसे ही हम दोनों अपनी चुदाई पूरी करके हांफते हुए एक-दूसरे से अलग हुए, तभी अचानक झोपड़ी का बांस का दरवाजा धीरे से खुला और रामू अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर एक कटीली और शातिर मुस्कान थी।
सपना उसे देखते ही बुरी तरह चौंक गई और तुरंत अपनी नाइटी और सलवार को अपने बदन पर लपेटने लगी। उसका पूरा बदन डर के मारे कांपने लगा।
मैंने गुस्से में उठते हुए अपनी पैंट संभाली और कहा, “रामू! तेरी इतनी हिम्मत कि तू बिना पूछे अंदर आ गया? बाहर निकल!”
रामू ने बिना डरे तख्त के सहारे अपनी लाठी टिकाई और बेहद रसीले लहजे में बोला, “छोटे मालिक, गुस्सा मत होओ। जो खेल आप दोनों खेल रहे थे, वह मैंने अपनी इन दोनों आँखों से पूरा देख लिया है। गाँव के बड़े-बुजुर्ग तो बस बात करते थे, पर सपना दीदी का यह गोरा-चिट्टा बदन तो वाकई कमाल है।”
उसने अपनी लुंगी के नीचे हाथ डाल कर अपने कड़े हो चुके 8 इंच के काले और मोटे लंड को बाहर निकाला, जो किसी गन्ने की तरह सख्त होकर सलामी दे रहा था। “अब बात सीधे-सीधे समझो मालिक। अगर चाहते हो कि यह बात पूरे गाँव में ना फैले और आपके घर तक ना पहुँचे, तो आज इस कोल्हू पर मुझे भी अपना यह गन्ना सपना दीदी के कोल्हू में डालने दो। बहुत दिनों से तरस रहा हूँ इसके लिए।”
सपना ने रोते हुए मेरी तरफ देखा, “भैया… प्लीज कुछ करो… यह क्या बोल रहा है…”पर मैं जानता था कि गाँव के माहौल में अगर यह बात बाहर गई, तो हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। रामू एक जिद्दी और ताकतवर मजदूर था, और इस वक्त बाजी उसके हाथ में थी। मैंने भारी मन से सपना की तरफ देखा और सिर झुका लिया।
सपना समझ गई कि अपनी इज्जत बचाने के लिए उसे आज इस देहाती लौंडे की हवस को शांत करना ही पड़ेगा। रामू ने बिना कोई वक्त गंवाए अपनी लुंगी पूरी तरह उतार फेंकी। वह सीधे पत्तियों के ढेर पर लेटी सपना के पास आया और उसने सपना के पैरों को पकड़ कर झटके से अपनी तरफ खींचा। सपना की नाइटी को उसने ऊपर की तरफ सरका दिया, जिससे उसके 32” के पपीते जैसे बूब्स दोबारा बाहर आ गए। रामू ने बिना किसी तमीज के सीधे उसके निप्पल्स को अपने मुंह में भर लिया और उन्हें किसी भूखे जानवर की तरह चूसने लगा।
“उई मां… भैया… देखो ना कैसे कर रहा है…” सपना के मुंह से सिसकी निकली, लेकिन रामू पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
रामू ने सपना की दोनों टांगों को चौड़ा किया। मेरी चुदाई की वजह से सपना की चूत पहले से ही पूरी तरह रसीली और गीली हो रखी थी। रामू ने अपने मोटे और काले लंड के मुहाने को उसकी बुर की फांकों पर सेट किया और अपनी पूरी मर्दाना ताकत लगा कर एक ही जोरदार धक्का मारा।
‘पकाक-सड़सड़-फच’ की एक ऐसी भयानक आवाज हुई कि सपना का पूरा बदन बिस्तर से ऊपर उठ गया। रामू का ८ इंच लंबा और मोटा गन्ना सपना के कोल्हू (चूत) के अंदर पूरा समा चुका था।
“आहहह… मर गई रे बाबा… उई मां…” सपना दर्द और मजे के उस मिले-जुले अहसास में चिल्ला उठी।
रामू ने बिना कोई रहम दिखाए देहाती अंदाज में ताबड़-तोड़ धक्के मारने शुरू कर दिए। झोपड़ी के अंदर अब ‘फच-फच-फच’, ‘चट-चट-चट’ की आवाजें पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई। रामू के भारी आंड जब सपना की कद्दू जैसी गांड के निचले हिस्से से टकराते, तो ‘फट-फट’ की तेज थाप गूंजती। वह सपना की कमर को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था, जिससे वहां नीले निशान पड़ रहे थे।
सपना पहले तो दर्द से कराह रही थी, लेकिन रामू के मोटे और लंबे लंड के लगातार लगते गहरे धक्कों ने जल्द ही उसे भी उत्तेजना की चरम सीमा पर पहुँचा दिया। वह भी अपनी आँखें बंद करके रामू के झटके झेलने लगी।
करीब 25 मिनट की इस बेरहम और जोरदार पिराई के बाद, रामू का पूरा बदन कांपने लगा। उसने एक आखिरी, चीरता हुआ गहरा धक्का मारा और अपना सारा गाढ़ा और गर्म वीर्य (रस) सपना की चूत की गहराई में खाली कर दिया। उसका पूरा कोल्हू रामू के काम-रस से पूरी तरह भर गया, जो रिस-रिस कर जांघों पर बहने लगा।
रामू हांफता हुआ सपना के ऊपर से हटा और अपनी लुंगी संभालते हुए मुस्कुरा कर बोला, “धन्यवाद छोटे मालिक, आज तो सच में जनम सुधर गया। अब यह राज हमेशा राज ही रहेगा।” इतना कह कर वह झोपड़ी से बाहर निकल गया।
सपना बिस्तर पर निढाल पड़ी थी, उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन उसका गदराया बदन शांत हो चुका था। मैंने आगे बढ़ कर उसे संभाला, उसे साफ किया और हम भारी कदमों से घर की तरफ बढ़ गए।
गाँव के कोल्हू का यह हादसा हमारे जीवन का सबसे अप्रत्याशित और रोमांचक मोड़ था। रामू ने सपना के कोल्हू का रस तो निकाला, लेकिन इस घटना ने हमारे बीच के रिश्ते को एक नए और अजीब से रोमांच में बांध दिया था। इसके बाद गाँव के जमींदार का जो किस्सा शुरू हुआ, वह इससे भी बड़ा धमाका है, जिसे जल्द ही अगले भाग में आपके सामने लेकर आऊंगा।
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