पिछला भाग पढ़े:- घूंघट की आड़ से देखा ससुर जी का फौलादी लंड-3
हिंदी सेक्स कहानी अब आगे-
मेरी वासना ने ससुर जी को रोकने के लिए बिना बोले ही रास्ता निकाल लिया। ससुर जी का एक हाथ अभी बेड पर टिका हुआ था; मैंने बड़ी हिम्मत जुटा कर, बिना कुछ कहे अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया और अपनी उंगलियों से उनकी हथेलियों को कस लिया। मेरे कोमल हाथ की उस प्यासी पकड़ से ससुर जी बखूबी समझ गए होंगे कि अब मैं उनसे क्या चाहती हूँ।
कुछ देर उनका हाथ थामे रखने के बाद मैंने अपना हाथ वापस खींच लिया। जो इशारा मुझे देना था, वह मैं दे चुकी थी। अब सब कुछ ससुर जी के ऊपर था। फिर भी मन में एक संकोच था कि वह वापस आएँगे या नहीं? मेरी तड़प अब बर्दाश्त के बाहर हो चुकी थी, मेरे जिस्म को बस एक सख्त मर्द की ज़रूरत थी।
मैं अपनी बच्ची की तरफ करवट लिए लेटी थी। मेरी खुली आँखें और नंगा जिस्म बस ससुर जी का इंतज़ार कर रहे थे। थोड़ी देर बाद मुझे बेड पर भारी दबाव महसूस हुआ, जिसे देखते ही मेरे दिल में खुशी की उमंग दौड़ गई और मेरी चूत में एक सरसराहट सी होने लगी।
ससुर जी का पूरा वज़न बेड पर पड़ते ही मेरी खुशी दोगुनी हो गई। वह धीरे-धीरे मेरे करीब बढ़े और मेरे बदन से चिपकते हुए मेरी गर्दन पर एक गहरा और गीला किस्स कर लिया। उफ़… इस चुंबन से मैं पूरी सिहर उठी और मेरा जिस्म उनकी बाहों में कसमसाने लगा।
ससुर जी को फिर से अपने बिस्तर पर पाकर मैं निहाल हो गई थी। मेरी चूत में जैसे चींटियाँ रेंगने लगी थी और वह प्यास के मारे हिलोरें ले रही थी।
ससुर जी जब बड़े आराम से मेरे बगल में लेटे और मेरे जिस्म से सटे, तो मैं हैरान रह गई। ससुर जी अब पूरी तरह नंगे थे और मेरी पीठ से एक-दम चिपके हुए थे। उनका पेट मेरी कमर से सटा हुआ था और उनका मोटा लंड मेरी गांड की दरार में फंसा हुआ था।
उफ़… ससुर जी के उस विशाल और सख्त लंड को अपनी नंगी गांड से टच होते ही मेरी आँखें बंद हो गई और मैं मदहोशी के समंदर में डूबने लगी। ससुर जी ने बड़े प्यार से अपना एक हाथ मेरे पेट पर रखा और फिर धीरे-धीरे ऊपर बढ़ते हुए मेरे एक बूब्स को अपनी हथेली में जकड़ लिया।
उनके हाथ की पकड़ काफी मज़बूत थी, मेरा पूरा बूब्स उनके पंजे में समा गया था।
ससुर जी धीरे-धीरे मेरे बूब्स को दबाए जा रहे थे और मेरा जिस्म आग की तरह गर्म पड़ रहा था। मैं बेकाबू होकर चिल्लाना चाहती थी, पर मेरी शर्म अब भी मुझे रोके हुए थी। ससुर जी ने अपनी गर्दन आगे बढ़ाई और मेरे गालों को चूम लिया, फिर मेरे होंठ खुद-ब-खुद उनके होंठों के बीच खिंचने और चूसने के लिए खुल गए।
ससुर जी ने मेरा चेहरा पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया और अपने होंठ मेरे होंठों पर जमा दिए। मैंने अपने होंठ उनके लिए पूरी तरह खोल दिए थे ताकि वह जी भर कर मेरा रस चूस सकें। मैंने अपनी आँखें बंद कर रखी थी, पर मन में एक डर भी था कि कहीं बिजली ना आ जाए, वरना इस चूत की प्यास की वजह से आज मैं शर्म से पानी-पानी हो जाऊंगी।
ससुर जी मेरे होंठों को चूसने के साथ-साथ मेरे बूब्स को भी बड़ी बेरहमी से मसल रहे थे। मैं उनके मुँह के अंदर ही दबी हुई आवाज़ में कराह रही थी, सिसक रही थी। रिश्ते की मर्यादा और लोक-लाज के कारण ससुर जी भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे।
ससुर जी पागलों की तरह मेरे होंठों को चूस रहे थे। फिर उन्होंने अपना हाथ बूब्स से हटाकर नीचे मेरी गीली चूत पर रख दिया। उफ़… उनका मर्दाना स्पर्श अपनी चूत पर दोबारा पाकर मैं पानी-पानी हो गई। उनकी उंगलियाँ मेरी चूत की मोटी फांकों में हलचल मचा रही थी; वह कभी चूत के दाने को रगड़ते, तो कभी चूत की गहराई नापते। मेरी चूत फिर से बुरी तरह लपलपा उठी थी और अब वह बस लंड के लिए गुहार लगा रही थी।
ससुर जी ने जब मेरे होंठों को आजाद किया, तो मैं लंबी-लंबी और गर्म साँसें लेने लगी। हाँफते हुए मेरी सिसकारियाँ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। तभी ससुर जी ने अपने दोनों हाथों से मेरी नाइटी पकड़ी, मैं तुरंत समझ गई कि वह अब मुझे पूरी तरह निर्वस्त्र करना चाहते हैं। वह नाइटी ऊपर खींचते गए और मैं अपना बदन उठाती गई ताकि नाइटी आराम से निकल सके।
पूरी तरह नंगी करने के बाद ससुर जी ने मुझे सीधा लिटा दिया और फिर वह मेरे ऊपर आ गए। माथे से गालों तक चूमते हुए उन्होंने फिर से मेरे होंठों को लॉक कर लिया। मैं ससुर जी के मजबूत और भारी शरीर के नीचे पूरी तरह बिछी हुई थी। मुझे इस काम-क्रीड़ा में अब रिश्तों की कोई परवाह नहीं थी।
कुछ देर बाद ससुर जी ने मेरे होंठों को छोड़ा और नीचे की तरफ बढ़े। गले को चूमते हुए वह मेरी उभरी हुई सुंदर चूचियों पर टिक गए। मेरी क्लीवेज के बीच पति के नाम का मंगलसूत्र फँसा हुआ था, जिसके दाएँ-बाएँ ससुर जी पागलों की तरह चूम रहे थे।
मेरा मंगलसूत्र आज बेबस था; जिसने इसे पहनाकर मेरा जिस्म अपने नाम किया था, आज उसी का बाप इस बदन का भोग लगा रहा था। मेरे मन ने कहा— “स्त्री का सुंदर जिस्म संभोग के लिए ही बना है, और इसे तृप्त करना उतना ही ज़रूरी है जितना जीने के लिए पेट भरना।”
ससुर जी ने मेरे एक बूब्स को अपने होंठों के नीचे दबा लिया और दूसरे को अपनी हथेली में ऐसे भींच रहे थे जैसे कोई संतरा हो।
उफ़… मैं उस वक्त जो मीठा आनंद पा रही थी, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। वह बारी-बारी से मेरी चूचियों को मुँह में भरकर चूस रहे थे, जिससे मैं पागल हुई जा रही थी। मेरी देह में ऐसी आग लगी थी कि मैं खुद अब ससुर जी के मोटे लंड को अपनी चूत में लेकर उसकी सवारी करना चाहती थी।
मेरी चूचियों में जो भी दूध बचा था, ससुर जी उसे निचोड़-निचोड़ कर पिए जा रहे थे। मेरी छाती अब हल्की महसूस हो रही थी क्योंकि ससुर जी ने उसे पूरी तरह खाली कर दिया था। जब ऊपर का काम हो गया, तो वह नीचे की ओर बढ़े। मेरी कमर को चूमते हुए ससुर जी ने मेरी दोनों टांगों को फैला कर पेट की तरफ मोड़ दिया।
फिर ससुर जी ने अपने होंठ मेरी चूत के ऊपरी हिस्से पर रगड़े। वह धीरे-धीरे अपने होंठों को मेरी चूत के दाने तक लाए और उसे बड़े प्यार से चूम लिया।
उफ़… इससे पहले मैंने यह सुख कभी नहीं भोगा था। अपनी चूत पर ससुर जी के होंठों की छुअन महसूस करते ही मैं तेज़ी से सिसक उठी और अपने दोनों हाथ उनके सिर पर रख कर उनके बालों को नोचने लगी।
मैं सिसकते हुए उन्हें हटाने की कोशिश कर रही थी, पर वह अपनी जीभ मेरी चूत की लंबी और गहरी फांकों में रगड़ रहे थे। जब ससुर जी का यह सब करना मुझे अच्छा लगने लगा, तो मैं खुद उनके बालों को सहलाने लगी। उफ़… चूत पर जीभ की वह रगड़ मुझे पागल किए जा रही थी। मैं पूरी तरह मदहोश हो गई और मेरी चूत ने बर्दाश्त खो दी; मैं सरसरा कर झड़ गई। उसके बाद मेरा जिस्म ढीला पड़ गया, पर ससुर जी तब भी मेरी चूत को चाटने में मशगूल थे।
चूत को पूरी तरह साफ़ करने के बाद ससुर जी मेरे ऊपर आए और मेरे होंठों पर अपने गीले होंठ रख दिए, जिस पर मेरी ही चूत का कामरस लगा हुआ था। मैं अपनी टाँगें फैलाए लेटी थी और ससुर जी मेरी जांघों के बीच थे। उनका सख्त लंड मेरी चूत के मुहाने पर रगड़ खा रहा था, जिससे मैं फिर से गर्म होने लगी। मैंने अपने दोनों हाथों से ससुर जी की कमर जकड़ ली और अपनी कमर उठा कर चूत को थोड़ा ऊँचा कर दिया ताकि उनके लंड को अच्छे से महसूस कर सकूँ।
उफ़… वह लंड आग की तरह गर्म और लोहे जैसा सख्त था। उनके लंड के सुपारे का आकार मुझे बहुत बड़ा और फूला हुआ महसूस हो रहा था। मेरी चूत फिर से गीली होने लगी थी और अब मैं उस मूसल के लिए पूरी तरह तड़प उठी थी। हम दोनों बिना कुछ बोले इस अंधेरी रात में अपने जिस्म को एक करने में लगे थे; आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी।
ससुर जी ने मेरे सिर के पास से एक तकिया उठाया और उसे मेरी गांड के नीचे लगा दिया। फिर मेरी टाँगों को फैला कर चूत के मुहाने पर लंड का सुपाड़ा रखा और उसे रगड़ने लगे। इतने महीनों बाद लंड का स्पर्श पाकर अब मुझसे इंतज़ार नहीं हो रहा था; मैं उस मोटे लंड को अपने अंदर समा लेना चाहती थी। मेरा मन चिल्लाकर कहना चाहता था— “ससुर जी, इसे अब मेरे अंदर उतार दो, मत तड़पाओ मुझे, मैं प्यासी हूँ!”
अपनी तड़प दिखाने के लिए मैं खुद अपने दोनों हाथों से अपने बूब्स मसलने लगी। ससुर जी यह देख कर भी अनजान बन रहे थे; वह चाहते थे कि मैं लंड के लिए उनसे गुहार लगाऊँ, पर मैं इतनी जल्दी बेशर्म नहीं होना चाहती थी।
आखिरकार, ससुर जी ने जब अपने लंड का सुपाड़ा मेरे अंदर उतारा, तो मेरे मुँह से एक लंबी “आहहहह… माई ई ई ई…” निकल गई। उनका सुपाड़ा वाकई बहुत मोटा था, मेरी तो जान ही निकल रही थी। महीनों से चुदाई ना होने के कारण मेरी चूत एक-दम कसी हुई थी और ससुर जी का लंड बहुत टाइट अंदर जा रहा था। मेरी चूत में जलन हो रही थी, जिसे मैं मज़े के लिए बर्दाश्त कर रही थी।
ससुर जी धीरे-धीरे अपना पूरा लंड मेरी चूत में उतार रहे थे। लंड के हर इंच अंदर जाने पर मैं बिदक रही थी। मैंने मुट्ठी में चादर जकड़ ली और अपने होंठ भींच लिए ताकि मेरी चीख बाहर ना जा सके। धीरे-धीरे ससुर जी का पूरा लंड मेरे अंदर समा गया; मेरी चूत में वह एक-दम फंसा हुआ था। ससुर जी मेरे ऊपर हल्का सा झुके और मेरे होंठों को लॉक कर लिया। फिर जब उन्होंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए, तब मेरी कसी हुई चूत ने लंड को जगह दी और मेरा दर्द कम होने लगा।
मुझे ऐसा दर्द अपनी सुहागरात पर भी नहीं मिला था, जितना आज अपने ससुर के साथ पहली चुदाई में मिल रहा था।
ससुर जी अब धक्कों की गति तेज़ कर रहे थे। उनके हर धक्के पर मेरे मुँह से “आह… उफ़… हाय…” निकल रहा था। मेरी चूत की खाल जल रही थी, फिर भी उनके मोटे और कठोर लंड की रगड़ बहुत मज़ा दे रही थी। मेरी चूत अपना कामरस छोड़े जा रही थी, जिससे हर धक्के पर ‘फच-फच, छप-छप’ की आवाज़ें कमरे में गूँज रही थी। ससुर जी की मर्दाना ताकत देख कर मैं हैरान थी।
थोड़ी देर बाद वह मुझे मिश्नरी पोज़िशन में और भी गहराई से चोदने लगे; उनके लंड की रगड़ से मेरी चूत बुरी तरह छिल गई थी।
फिर भी मैं मदहोश थी; इतने दिनों बाद अपने पति से भी अच्छी और ज़ोरदार चुदाई मिल रही थी। ससुर जी के हर धक्के को मैं अपनी बच्चेदानी पर महसूस कर रही थी। जब भी लंड मेरी कोख से टकराता, मैं कराह उठती। ससुर जी लंबी रेस के घोड़े थे; उनकी इस चुदाई में मेरी चूत कई बार पानी छोड़ चुकी थी। फिर उन्होंने मुझे पेट के बल लेटाया और मेरी पीठ पर चढ़ कर पीछे से अपना लंड चूत में उतार दिया। उफ़… इस पोज़िशन में उनका लंड सीधा मेरी कोख में धँस रहा था।
मैं “आई माँ… आई माँ…” कर रही थी; ससुर जी तो जैसे मेरी जान ही निकाल रहे थे। मेरी तकलीफ देख कर वह झट से मुझे सीधा करके ऊपर चढ़ गए। अब उनकी रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई थी। वह हाँफते हुए गरजने लगे और मैं समझ गई कि ससुर जी अब झड़ने वाले हैं। मैंने अपनी टाँगें उनकी कमर में जकड़ ली। ससुर जी का लंड मेरी बच्चेदानी के मुँह पर अपना गर्म वीर्य उगल रहा था; उनके लंड ने झटके ले-लेकर मेरी चूत को पूरी तरह भर दिया। इतना मीठा सुकून मुझे आज तक नहीं मिला था। मैं भी ससुर जी के साथ बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़ी।
ससुर जी कुछ देर मेरे ऊपर निढाल पड़े रहे, फिर धीरे से बगल में लेट गए। महीनों बाद मुझे वह चरमसुख प्राप्त हुआ था जिसकी मैं प्यासी थी। मैं उनसे कुछ कह तो नहीं पा रही थी, पर आहिस्ता से खिसक कर अपना सिर उनके चौड़े सीने पर रख दिया।
मैं मन ही मन सोच रही थी: “मुझे अरसे से इसी स्पर्श और प्यार की ज़रूरत थी। ससुर जी, आप जब कहेंगे मैं आपके नीचे बिछ जाऊँगी। जो चरम आनंद आपने मुझे पल भर में दिया, वह राजू भी कभी नहीं दे सका।”
ससुर जी ने जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली हो; उन्होंने तुरंत अपनी हथेली से मेरी नंगी पीठ सहलाई और बोले— “बहू, मेरा प्यार तुम्हें अच्छा लगा है, यह तुमने मेरे सीने से लग कर साबित कर दिया। मैं हमेशा से खुद को खुशनसीब समझता था कि मुझे तुम्हारे जैसी सुशील और सुंदर बहू मिली है।”
उनकी बात सुन कर मैं उनसे और भी कस कर लिपट गई और उसी गर्माहट में मुझे गहरी नींद आ गई। कुछ घंटों बाद, ससुर जी फिर से मेरे जिस्म के साथ खेलने लगे, जिससे मेरी आँखें खुल गई। वह मेरे बूब्स चूस रहे थे और उनका लंड फिर से लोहे की तरह सख्त हो चुका था। उन्होंने मेरी टाँगें फैलाई और दोबारा कामुक चुदाई शुरू कर दी। दूसरी बार का यह दौर पहले से भी लंबा चला। उन्होंने अपने लंड का सारा लावा मेरे मखमली बदन पर उगल दिया। इस दूसरी पारी ने मेरे जिस्म को पूरी तरह तोड़ दिया था; मैं नग्नावस्था में ही निढाल होकर सो गई।
सुबह जब मेरी आँख खुली, तो देखा कि बिस्तर पर ससुर जी नहीं थे। मैंने अपने नंगे जिस्म को चादर से ढका हुआ पाया, तो शर्म से लाल हो गई। ससुर जी ने रात भर मेरी ज़ोरदार चुदाई करने के बाद मुझे चादर से ढका—उनका यह अंदाज़ मेरे दिल को छू गया।
जब मैंने बेड से उतरने की कोशिश की, तो चूत में हल्का दर्द महसूस हुआ। मैंने एक नज़र नीचे डाली—ससुर जी के मोटे और कठोर लंड के प्रहार से मेरी चूत बुरी तरह लाल और सूजी पड़ी थी, उसके होंठ भी काफी खुले हुए थे।
मैं धीरे-धीरे कदमों से बाथरूम गई और नहा-धोकर तरो-ताज़ा हुई। जब शीशे में खुद को देखा, तो मन में शर्म और पछतावे का मिला-जुला अहसास हुआ। मैं रात कितनी बहक गई थी, यह सोच कर संकोच हो रहा था, पर मन का एक कोना उस मीठे सुकून को भी याद कर रहा था जो दुनिया की नज़र में गलत, पर एक प्यासी औरत के लिए बिल्कुल सही था।
खुद को संवारते हुए मैंने मन ही मन कहा— “रात जो हुआ, वह दो जिस्मों की गलती थी। ससुर जी मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे? मैंने अपने पिता समान ससुर के नीचे अपनी आग शांत की… अपने पति को इतना बड़ा धोखा दिया है। अगर उन्हें पता चला कि उनकी गैर-मौजूदगी में उनके बाप ने ही मुझे चोद दिया है, तो वह जीते-जी मर जाएँगे। अब आगे मैं खुद को इस तरह फिसलने नहीं दूँगी।”
मैंने नाश्ता बनाया, पर ससुर जी का कहीं पता नहीं था। कुछ घंटों बाद वह आए और सीधा नहाने चले गए। उनके सामने जाने में मुझे अब घबराहट हो रही थी, इसलिए उनके कपड़े और नाश्ता चारपाई पर रख कर मैं हट गई।
हालत यह थी कि हम दोनों एक ही घर में होकर भी एक-दूसरे से नज़रें चुरा रहे थे। आखिर एक दिन उन्होंने मेरे पति को फोन करके बुलाया और कहा— “मेरा जीवन तो तुम्हारी माँ के बिना अधूरा है ही, पर तुम अपनी पत्नी और बच्ची के बिना अपनी गृहस्थी खराब मत करो।” ससुर जी समझ चुके थे कि वह रात हमारे अकेलेपन की एक बड़ी भूल थी।
अब मैं अपने पति के साथ गुजरात में रहती हूँ। मेरा जीवन फिर से पटरी पर लौट आया है, पर आज भी वह भयानक और कामुक रात मेरी यादों में ज़िंदा है। वह पाप और वह दाग शायद मेरी ज़िंदगी से कभी नहीं मिट पाएगा।
दोस्तों, यह कहानी यहीं समाप्त होती है। एक स्त्री की बेबसी, अकेलापन और फिर एक गलत कदम की यह दास्तां आपको कैसी लगी? फीडबैक ज़रूर दें।
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