रात को गाँव लौटने में देर हो गई, क़रीब दो बज गए। मां-बाबूजी सो चुके थे। कमल का कमरा घर में पीछे की तरफ था। वो दीवार फाँद कर अपने कमरे में जाकर सो गया। उसके दीवार फाँदने से कुछ जानवर जाग जरूर गए थे, क्योंकि उनका बाड़ा कमल के कमरे से लग कर ही था।
कमल हॉस्टल में रहता है। शहर में ही अपनी पढ़ाई करता है। 19 साल की उम्र में भी शरीर पूरा जवान। उसकी मां ने उसे 20 साल की उम्र में ही जन्म दे दिया था। मां एक ग्रहणी है जो अपने परिवार और उनके लालन-पोषण का ध्यान रखती है।
बछड़े और कटरे की आवाज़ों से सुबह सवा-पाँच ही आँख खुल गई। अक्सर इसी वक्त मां बाड़े में जाकर गायों और भैसों को पानी पिलाती, चारा डालती और दूध निकालती। शायद मां ने उन्हें पानी पिला दिया था। जैसे ही उनकी आवाज़ बन्द हुई कमल की वापिस आँख लग गई।
मां की आवाज़ सुन कर दुबारा आँख खुली। जब आँख खुली तो पाया कि मां पास ही पलँग पर बैठी सिर पर हाथ फेर रही थी।
मां: उठ जा बेटा। धूप सिर चढ़ आई है।
कमल: इतनी जल्दी?
मां: जल्दी, दोपहर के खाने का वक़्त हुआ है।
वक़्त का पता देते हुए मां कमल की कम्बल लेकर समेटने लगी।
कमल: रात को देर होने की वजह से नींद लंबी हो गई।
मां: कोई बात नहीं उठ और हाथ मुंह धोकर आजा। मैं चाय बना देती हूं।
कमल हाथ मुंह धोकर फ्री हुआ और घर में गया। मां रसोई में थी और बूढ़ी दादी चौक में लगी चार पाई पर लेटी थी। कमल दादी के पास गया तो देखा की दादी नींद में थी। कमल ने फिर घड़ी की तरफ देखा बारह बजने को थे।
कमल: आज तो बहुत देर हो गई (कमल ने रसोई में आते हुए कहा)।
मां: कोई बात नहीं। ये ले चाय पी। मैं खाना बना देती हूं।
कमल: अभी भूख नहीं है मां, रहने दो। मैं अपने दोस्तों से मिल कर आऊँगा।
मां: अच्छा ठीक है।
कमल: रात को आता हूं मां।
मां: ज़्यादा देर मत करना कमल।
क़रीब साढ़े आठ बजे रात के खाने और रसोई से फ्री होकर मां अपने कमरे में गई। कमल के बाबूजी पलँग पर ही थे। उन्होंने आते ही मां को लेटने को कहा। जैसे ही मां पलँग पर लेटी बाबूजी ने घाघरा उठा दिया। फिर मां के पैरों को उठा कर उनके बीच आकर बिना कोई पल गंवाए यौन-क्रिया करने लगे। कोई 3-4 मिनट में ही उनका झड़ गया।
मां: मैं ज़रा बाड़े में जाकर पशुओं को देख आऊँ।
मां ने उठ कर अपना घाघरा सही किया और अपनी चूत से निलकते हुए वीर्य को अच्छे से पोंछते हुए कमरे से निकल गई।
पीछे वाले दरवाज़े से बाहर आकर वो सीधा कमल के कमरे में गई। कमल वहां नहीं दिखा तो उन्हें लगा कि शायद अभी तक अपने दोस्तों से मिल कर लौटा नहीं। फिर वो बाड़े की तरफ बढ़ी और दरवाजा खोल के अन्दर गई। अंदर आकर उन्होंने एक बार फिर अपनी चूत साफ की।
बाड़ा काफ़ी खुला-खुला था। कमल ने उसमें एक कोने में चारपाई बिछा रखी थी और एक पँखा भी था वहां पर। मां ने सोचा की कुछ देर कमल का यहीं इंतेज़ार करती हूं, अगर आ गया तो ठीक वर्ना वापिस चली जाऊँगी। जब मां चारपाई के पास पहुँची तो कमल वहीं बैठा उनका इंतेज़ार कर रहा था।
मां: तू यहां बैठा है, मैं तेरे कमरे में गई थी तुझे ढूँढती।
कमल: कितनी देर कर दी मां।
मां: हां रसोई का काम और तेरे पापा दोनों को निपटा के आई हूं।
जैसे ही मां चारपाई के क़रीब पहुँची, कमल ने उनका घाघरा उठाया और अपना मुंह सीधा मां की चूत में दे दिया। मां ने घाघरा पकड़ कर कमल के ऊपर से उस पर डाल दिया।
मां: कल भी कितना इंतेज़ार किया तेरा, क़रीब आधे घण्टे यहीं बैठी रही के तू आएगा (कमल के सिर पर हाथ फेरते हुए मां ने कहा)।
कमल: क्या करता मां, बस ही छूट गई। वर्ना तुझे क्यों इंतेज़ार करवाता?
मां: अब जल्दी कर, दो महीने हो गए तूने मुझे ठीक से प्यार नहीं किया।
कमल मां की नाराज़गी जानता था। वो घाघरे से बाहर निकला, मां को कंधे से पकड़ा, चार पाई पर सुलाया, टाँगे उठाई, घाघरा साइड किया और चारपाई के नीचे बैठ कर वापिस मां की चूत को चाटने और चूसने लगा।
दो उंगलियाँ चूत में डाल कर, चूत के ऊपर के दाने को कमल होठों में भर कर अपनी जीभ से कुरेदने लगा। दूसरे हाथ से मां की जाँघ को पकड़ कर, धीरे-धीरे दोनों उंगलियों को अंदर बाहर करते हुए कमल ने अपना पूरा ध्यान मां की चूत के दाने पर लगाया।
मां सिसकियाँ लेने लगी। उनकी साँसे भारी और गहरी होती जा रही थी। कूछ देर लगातार इसी तरह चूत के दाने का सेवन करने से मां पूरी तरह गर्म हो गई और उनकी चूत लिपलिपाने लगी।
मां: कमल, बेटा अब देर मत कर।
कमल: हां मां।
कहते हुए कमल खड़ा हुआ और अपना पजामा उतार कर, चारपाई के किनारे रख कर, मां को थोड़ा ऊपर होने का इशारा करते हुए चारपाई पर मां के पैरों के बीच आ गया।
एक हाथ में थूक भर के अपने लंड पर मसल कर अपना लंड चूत पर रखा और दूसरे से मां के पैर को पकड़ कर अपना आसन सही किया। क़मर को हिलाते हुए कमल ने अपना पूरा लंड चूत में डाल दिया। मां के मुंह से आह निकली और उन्होंने एक हाथ कमल के सीने पर रख कर उसे रुकने को कहा और दूसरे हाथ से सिरहाने को नोचने लगी।
कमल ने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर मां के स्तनों को मसलना शुरू किया। कुछ सेकंड रुक कर मां ने कमल को उसके गिरेबान से पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और कस कर बाहों में भर लिया। कुछ देर इसी तरह रहने के बाद…
मां: मेरा बेटा।
कहते हुए मां ने कमल के पूरे चेहरे पर चुम्बनों की बरसात कर दी। कमल ने फिर अपने हाथ मां के नीचे ले जाकर मां को कस के पकड़ लिया और अपनी क़मर को हिलाते हुए चुदाई शुरू कर दी। मां शायद इसके लिए तैयार नहीं थी, इतना वक़्त जो हो गया था।
मां: आह… कमल धीरे… धीरे मेरे बच्चे… आह… मां… और मां ने कमल को कस कर बाहों में जकड़ लिया ताकी कमल थोड़ा धीरे पड़ जाए।
कमल थोड़ा धीरे पड़ा पर रुका नहीं। कुछ देर मां का चेहरा तनाव में रहा। कुछ ही देर में मां आसानी से कमल का साथ देने लगी। कमल ने फिर अपने हाथ मां की क़मर के बराबर रख कर उनका सहारा लेकर चूत पर अपने लंड के प्रहार तेज कर दिया।
मां ने हर प्रहार का साथ देते हुए अपने अंगिया के आगे की अंकड़ियाँ खोल दी। मां का पूरा बदन हिल रहा था। धीरे-धीरे दोनों की साँसें गहरी होने लगी। थपकियों की आवाज़ से पूरा बाड़ा गूँज रहा था। बाड़ा घर के पीछे होने की वजह से दोनों को कोई डर नहीं था कि आवाज़ कहीं बाहर ना जाए।
कमल पसीना-पसीना हो गया था। उसने बिना रुके, बिना थके एक ही गति में लगातार प्रहार किए। मां ने अपनी ओढ़नी से कमल का चेहरा साफ किया। कमल ने मुस्कुराते हुए झुक कर मां के होठों को अपने होठों में भरते हुए चूम लिया।
मां: तू थक गया है, नीचे आजा, मैं ऊपर आ जाती हूं।
कमल ने रुक कर एक साँस भारी। फिर घुटनों के बल बैठ गया। मां उठी और चारपाई से नीचे उतर कर खड़ी हो गई। कमल ने एक नज़र मां को देखा और पीठ के बल लेट गया। मां ने चारपाई पर चढ़ते हुए कमल को अपने पैरों के बीच लिया और झुक कर लंड पकड़ कर चूत में लेते हुए बैठ गई। फिर अपने घाघरे को उठा कर पीछे करते हुए आगे झुक कर हाथों का सहारा लिया और अपने चूतड़ ऊपर-नीचे करने लगी।
कमल: मां, शहर में मुझे तेरी बड़ी याद आती है।
मां: याद तो मैं भी तुझे बहुत करती हूं बेटा (मां ने ऊपर नीचे होना लगातार जारी रखा)। तू यहां नहीं भी होता तो भी मैं बाड़े में जरूर आती हूं।
कमल: मां मेरे साथ शहर चलो ना, हम अलग कमरा लेकर रहेंगे।
मां: चाहती तो मैं भी यही हूं पर तेरी दादी और इन पशुओं को किसके भरोसे छोड़ूँ?
इसके बाद कमल ने कुछ नहीं कहा और थोड़ा सा अपना सिर उठा कर मां का दूध पीने लगा। मां ने ख़ुद को संभाला की कहीं उनके ज्यादा हिलने की वजह से कमल के मुंह से उनका स्तन ना निकल जाए।
दोनों को इतना आनंद आ रहा था कि किसी भी बात की परवाह ना थी उन्हें। मां लगातार लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी और कमल बारी-बारी से दोनों स्तनों का पान कर रहा था। समय से आज़ाद पर प्यार में बंधे हुए दोनों पूरी तरह एक दूजे में खोए हुए थे।
स्तन-पान से मां पूरी तरह गरम हो गई और कुछ ही क्षणों में उन्हें चरमसुख की प्राप्ति हो गई। वो सुख जिसके लिए वो आप बेटे के पास आई थी। मां थक कर कमल पर निढाल हो गई। कमल ने मां को अपनी बाहों में भर लिया। कुछ देर बाद मां उठी…
मां: ले, तू पीछे आजा। कहते हुए मां चारपाई से उतरी और कमल भी उठ खड़ा हुआ।
फिर मां चारपाई पर ही झुक गई और कमल ने पीछे आकर एक हाथ क़मर पर रखते हुए दूसरे से अपना लंड चूत के मुंह पर लगाया। फिर दोनों हाथों से क़मर पकड़ कर लंड चूत में डाल दिया और मध्यम गति में प्रहार करने लगा। मां ने आनंद में अपनी आँखों बंद कर ली।
इस अवस्था में कमल काफी देर तक चुदाई करता रहा और आखिर में वो झड़ गया। वो मां की पीठ पर ही निढाल हो गया। कुछ देर में मां खड़ी हुई और अपना अंगिया बंद करने लगी।
मां: चल पजामा पहन ले चलते हैं।
मां ने अपनी ओढ़नी सिर लेते हुए कहा और बाड़े से बाहर निकल कर घर में चली गई। कमल ने थोड़ी देर सुस्ताने की सोची और वहीं थोड़ी देर में उसकी आँख लग गई। मां ने जब सोने से पहले चौक में घड़ी की तरफ देखा तो को उसमें ग्यारहर बज रहे थे।
लेट कर मां मन ही मन, ‘दो घंटे से भी ज़्यादा हो गए। कोई ना महीनों के बाद तो इतना बनता है।’ और मुस्कुराते हुए मां सो गई।
सुबह मां अपनी नित के काम में लग गई और आदतन बाड़े में पहुँची। बाड़े में उनको कमल दिखा।
मां: कमल, रात भर यहीं सोता रहा बेटा।
कमल ने करवट ली और अधखुली आँखों से मां की तरफ देखा। वो अभी भी नँगा था और उसका लंड भी पूरा खड़ा था। मां ने ललचाई नज़रों से उसे देखा और हाथ बढ़ा कर मुट्ठी में भर लिया। कमल अभी भी नींद में ही था।
सुबह के पाँच बजे थे और बाहर अँधेरा भी था। मां ने एक पल के लिए कुछ सोचा और कमल को सीधा लिटाया और चढ़ गई चारपाई पर। बिना किसी झिझक और पशोपेश के मां ने अपना घाघरा उठाया और कमल का लंड पकड़ कर उस पर बैठ गई।
‘आह…’ की गहरी आवाज़ के साथ मां ने एक साँस ली और फिर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगी। सुबह के वक़्त लंड का तनाव अपने चरम पर होता है जिसका पूरा फ़ायदा मां उठा रही थी।
मां: ह्म्म्म,,, कमल उठ जा मेरे बच्चे,,, आह,,,। मां ने बिना रुके कमल को उठाने की कोशिश करी। कमल नींद का पक्का था। क़रीब पाँच-सात मिनट तक मां के लगातार चुदाई करने के बाद कमल की आँख खुली। उसने मुस्कुराते हुए मां की तरफ देखा।
मां: क्या देख रहा है। मां नहीं देखी पहले कभी।
कमल: तेरे सिवा तो और कुछ देखा ही नहीं मां।
कह कर कमल ने मां को हवा में ही रुकने का इशारा किया और मां की जांघों को नीचे से पकड़ते हुए ख़ुद अपना लंड ऊपर नीचे करने लगा। इस अवस्था मे लंड की चोट बड़ी करारी लगती है।
मां सांतवें आसमान पर पहुँच गई और थोड़ी ही देर में चरमसुख प्राप्त कर कमल पर निढाल हो गई।
मां: शुक्र है जो तू मुझे मिल गया। ना जाने मेरा क्या होता।
कमल: कुछ नहीं होता, इतना मत सोचो मां। मैं हूं ना।
मां चारपाई से नीचे उतर गई और कमल का लंड बाहर आ गया। कमल की तरफ देख कर मां के मन में आया कि मेरा तो हो गया मेरा बेटा अभी भी तनाव में है। अचानक ही वो वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल आते हुए घाघरा उठा कर घोड़ी बन गई। कमल ने जब सवालिया नज़रों से देखा तो मां ने जवाबी इशारा दिया कि चढ़ जा बेटा।
कमल ख़ुशी-ख़ुशी अपना लंड चूत में डाल कर मां पर झुक गया और अपनी गति में आ गया। कमल ने करीब दस मिनट लिए झड़ने में। इस बीच उसने मां के स्तनों को अंगिया के ऊपर से ख़ूब सहलाया और मसला भी।
फिर कमल खड़ा हुआ अपना पजामा पहना और बाड़े से बाहर चला गया। मां ने अपना काम निपटाया और दूध से भरी बाल्टी लेकर वो भी घर में चली गई।
इनका चुदाई संबंध इस बाड़े तक ही सीमित है। इसके बाहर वो कोई यौन सम्बन्धी क्रिया नहीं करते। सिलसिला कब शुरू हुआ कैसे शुरू हुआ, ये एक लम्बी कहानी है।