पिछला भाग पढ़े:- मेरी चुदक्कड़ चाची-7
जैसा कि आपने पिछली सेक्स कहानी में पढ़ा कि कैसे मैं और चाची, चाची के मायके गाँव में शादी में जाते हैं और वहाँ पूरी तरह कांड मचा देते हैं। जब हम वापस पहुँचे तो पता चला कि पापा आ चुके थे।
दादी के गुजर जाने के बाद अब चाचा-चाची भी हमारे साथ मुंबई में रहने वाले थे। चाचा खेती छोड़ कर पापा के बिजनेस में हाथ बटाने लगे। चाची के अंदर अलग ही चमक थी और मेरे अंदर उन्हें शहर में नए रूप में देखने की बेचैनी।
गाँव की शांति पीछे छोड़ कर हम शहर के छोटे से 4th फ्लोर अपार्टमेंट में पहुँचे। कुछ दिनों के लिए चाची-चाचा हमारे साथ रहने वाले थे, बाद में पापा ने बगल में ही उनके और छोटू के लिए फ्लैट खरीद लिया। उस दिन चाची ने हल्का गुलाबी कॉटन साड़ी पहना था। शहर की गर्मी से साड़ी उनके जिस्म से चिपक गई थी, हर मोड़ साफ़ झलक रहा था। रात को सामान अनपैक करते वक्त माहौल में फिजिकल टेंशन थी। चाचा-पापा हाल में टीवी देख रहे थे। छोटा अपार्टमेंट था, किचन में कंधे टकरा रहे थे। मैंने छेड़ा-
अनुज: चाची, गाँव में तो शेरनी की तरह चलती थी, यहाँ इतनी सहमी क्यों हो? यहाँ कोई टोकने वाला नहीं।
चाची: अनुज, सब नया-अनजान है। गाँव के कपड़े, गाँव का ढंग… यहाँ सब मॉडर्न हैं।
पड़ोस की बालकनी में एक मॉडर्न ड्रेस वाली औरत देख कर वो और कॉन्शियस हो गई। मैंने कमर पकड़ कर खींचा-
अनुज: अरे मेरी जान, शहर में सब अपने काम में मस्त रहते हैं। अब हमें कोई नहीं रोक सकता।
मैं किस्स करने ही वाला था कि छोटू आ गया। हम अलग हुए। खाना खाकर सो गए।
अगली सुबह चाचा-पापा जल्दी काम पर चले गए, छोटू को भी साथ ले गए। किचन में चाय बनाते वक्त मेरे हाथ से गिलास गिरा, पानी चाची के सूट पर गिर गया। साड़ी पतली थी, गीली होकर पूरी ट्रांसपेरेंट हो गई। मेरी नज़रें उनके सीने पर ठहर गई। चाची का चेहरा लाल हो गया। मैंने पास जाकर कहा-
अनुज: आपको शहर के हिसाब से बदलना होगा। ये गाँव के कपड़े यहाँ नहीं चलेंगे। चलो मॉल, कुछ ऐसा लेते हैं जो आपको और खूबसूरत बनाए।
हम मॉल गए। चाची ने काली शिफॉन की साड़ी पहनी थी। ब्लाउज इतना डीप नेकलाइन वाला था कि उनकी गहरी क्लीवेज पूरी साफ़ दिख रही थी। दोनों मम्मे साड़ी के पल्लू के नीचे से भारी-भारी उभार लिए हुए थे, बीच की दरार इतनी गहरी कि आदमी की नज़रें फँस जाएँ।
साड़ी उनके बदन से इस तरह लिपटी थी कि पतली कमर, गोल गाँड के दोनों टुकड़े और जाँघों के हर मोड़ साफ़ झलक रहे थे। पसीने से साड़ी और चिपक गई थी। मॉल के मेन कॉरिडोर में जैसे ही हम चले, मर्दों की नज़रें उन पर चिपक गई। कोई घूर रहा था, कोई पीछे मुड़-मुड़ कर देख रहा था।
मैं उनके बिल्कुल करीब होकर कान में फुसफुसाया-
अनुज: देख चाची, कैसे सब तुझे नंगी आँखों से घूर रहे हैं… जैसे उन्हें पता हो कि इस साड़ी के नीचे कितनी गरम चूत और भारी मम्मे छुपे हैं। तेरी ये डीप क्लीवेज देख कर सब के लंड खड़े हो गए होंगे साली।
चाची: अनुज… चुप कर… लोग सुन लेंगे।
पर उनकी साँसें तेज़ हो रही थी।
एस्केलेटर पर मैं उनके ठीक पीछे खड़ा था। नीचे से आने वाली भीड़ की नज़रें उनकी लचकती कमर और उभरी हुई गाँड पर थी। हर स्टेप के साथ उनकी गाँड मेरे लंड से रगड़ खा रही थी। मैंने पीछे से कमर पर हाथ रखा और धीरे से दबाया।
अनुज: क्या मस्त गाँड है तेरी चाची… शहर में सब तेरी इस गांड को चोदने को तरस रहे होंगे। अभी तो सिर्फ मैं ही तेरा बॉडीगार्ड बना हूँ।
चाची ने पल्लू और नीचे गिरा दिया, जैसे अब इस अटेंशन का मज़ा लेने लगी हो।
हम एक बड़े शोरूम की तरफ बढ़े। भीड़ ज़्यादा थी, सेल्सगर्ल बिज़ी थी। चाची ने सूट ट्राई करते वक्त जान-बूझ कर दबी आवाज़ में ‘पीछे की ज़िप’ की मदद के लिए इशारा किया। मैं मौका देखते ही केबिन में दाखिल होकर अंदर से कुंडी लगा दी।
मैंने दरवाज़ा लॉक किया। चाची ने आईने की तरफ देखते हुए पल्लू ढीला कर दिया। काली शिफॉन साड़ी कंधे से सरसराती हुई नीचे गिरने लगी, गोरी नर्म पीठ पूरी नंगी हो गई। मैंने हाथ उनकी कमर पर रखे। हथेलियों की गर्मी से उनके रोंगटे खड़े हो गए। कान में दबी आवाज़ में कहा।
अनुज: गाँव में तो बड़ी मर्यादा की बातें करती थी साली, पर यहाँ इस बंद केबिन में तेरी ये थरथराहट कुछ और ही कह रही है। तेरी ये गहरी क्लीवेज और भारी मम्मे देख कर मेरा लंड पहले से ही फटने को तैयार है।
उंगलियाँ पीठ पर नीचे से ऊपर फेरी तो उन्होंने आँखें मूंद ली, होठों से सिसकी निकली।
बाहर सेल्सगर्ल ने खटखटाया: मैम, साइज़ ठीक है ना?
चाची सिहर गई। घबरा कर मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने नहीं छोड़ा। सीना मेरे हाथ से बार-बार टकरा रहा था। कांपती आवाज़ में बोली।
चाची: ह-हाँ… ठीक है… बस दो मिनट।
डर और कामुक टेंशन ने तड़प और बढ़ा दी। मैंने उनके कान में कहा।
अनुज: अब चुप-चाप खड़ी रह रंडी… तेरी चूत पहले से भीग रही होगी ना? मॉल के बीचों-बीच तेरी ये हालत देख कर मज़ा आ रहा है।
चाची: साले… चुप रह… वरना बाहर चिल्लाऊंगी।
पर उनका जिस्म मेरे हाथों का साथ दे रहा था। शोरूम से निकल कर हमने ऑटो लिया। पिछली सीट पर अंधेरा। चाची खिड़की से बाहर देख रही थी, पर ध्यान मेरी तरफ था। मैंने हाथ साड़ी के पल्लू के नीचे सरका कर नर्म कमर और पेट पर फेरना शुरू किया। ऑटो गड्ढे से टकराता तो मेरा जिस्म उनके से और ज़ोर से दब जाता। हाथ उनके भारी स्तनों तक बढ़ाया और हल्का दबाया।
चाची: अनुज… रुक जा… ड्राइवर देख लेगा।
अनुज: उसे सिर्फ रास्ता दिख रहा है चाची… ये नहीं पता कि पीछे तू कितनी बेचैन हो रही है। तेरे ये मम्मे इतने गरम हैं कि हाथ जल रहा है। तेरी चूत में उंगली डालूँ तो पानी निकल आएगा साली।
मैंने और नीचे हाथ बढ़ाया, पेटीकोट के अंदर उंगली सरका कर उनकी गीली चूत पर हल्का मला।
चाची: आह… साला… मत कर… घर पहुँचने दे…
बीस मिनट का सफर इम्तेहान बन गया। मैंने उन्हें हर तरह से छेड़ा, चूत पर उंगली घुमाई, मम्मों को दबाया, गालियाँ दी। वो बस घर पहुँचने के लिए तड़पने लगी।
घर पहुँचे तो पूरा फ्लैट खाली था। दरवाज़ा बंद करते ही चाची दीवार से सट गई। मैंने उन्हें कस कर पकड़ा और होठों पर हमला बोल दिया। जीभ उनके मुँह में घुसा दी। चाची ने भी जवाब दिया, मेरे होंठ चूसने लगीं। मैंने साड़ी का पल्लू खींच कर फर्श पर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। भारी गोरे मम्मे बाहर निकल आए, निप्पल्स पहले से कड़े। मैंने एक मम्मा मुँह में लिया और ज़ोर से चूसा।
चाची: आह… अनुज… ज़ोर से चूस साले… मेरे मम्मे चूस…
मैंने दूसरा मम्मा भी दबाया, दाँतों से निप्पल काटा। चाची की उंगलियाँ मेरे बालों में फँस गई। मैंने पेटीकोट नीचे खींच दिया। उनकी चूत पूरी भीगी हुई थी, बालों पर चमक रहा था। मैंने उंगली अंदर घुसाई। चूत इतनी गरम और गीली थी कि उंगली आसानी से अंदर चली गई। दो उंगलियाँ, फिर तीन। चाची दीवार से सट कर कमर हिलाने लगी।
चाची: आह… आह… और अंदर… मेरी चूत फाड़ दे साले…
मैंने उन्हें बिस्तर पर धकेल दिया। खुद नंगा हो गया। मेरा लंड पूरा खड़ा, नसों से भरा हुआ। चाची ने खुद ही लंड पकड़ लिया और मुँह में ले लिया। पहले सिरे को चूसा, फिर पूरा अंदर ले गई। गले तक। मैंने उनके सिर को पकड़ कर ज़ोर से अंदर-बाहर किया। चाची की आँखों से पानी निकल रहा था, पर वो रुक नहीं रहीं थी। लार टपक रही थी, गले की आवाज़ें आ रही थी।
अनुज: चूस रंडी… पूरा निगल… तेरे मुँह की चूत बना दी मैंने।
कुछ देर बाद मैंने लंड निकाला और चाची को उल्टा कर दिया। कुतिया बना कर गाँड ऊपर की। उनकी गीली चूत साफ़ दिख रही थी। मैंने लंड चूत के मुँह पर रखा और एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया।
चाची: आह्ह्ह… साला… पूरा अंदर… मेरी चूत फट गई…
मैंने कमर पकड़ कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ उनके मम्मे बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे, गाँड मेरे पेट से टकरा रही थी। चूत की आवाज़—“छप-छप-छप”—पूरे कमरे में गूँज रही थी।
मैंने और तेज़ किया। एक हाथ से उनकी गाँड दबाई, दूसरे से बाल पकड़ कर सिर पीछे खींचा।
अनुज: कैसी लग रही है शहर की चुदाई चाची? गाँव वाले रमेश से बेहतर है ना मेरा लंड? बोल साली…
चाची: हाँ… हाँ… तेरा लंड… बहुत मोटा… मेरी चूत को चीर रहा है… और ज़ोर से चोद… मुझे रंडी बना दे…
मैंने पोजीशन बदली। उन्हें सीधा लिटाया, टाँगें कंधों पर रखी और पूरा वजन डाल कर चोदने लगा। हर धक्के में लंड जड़ तक जा रहा था। चाची की आँखें पलट रही थी, मुँह से लार टपक रही थी। मैंने उनके मम्मों को दोनों हाथों से दबाया और निप्पलों को मरोड़ा।
चाची: आह… मेरी चूत… पानी निकाल रही है… झड़ने वाली हूँ…
उनकी चूत सिकुड़ने लगी, दीवारें कसने लगी। मैंने और तेज़ धक्के मारे। चाची का शरीर काँप उठा, चूत से गर्म पानी की धार निकल पड़ी, मेरे लंड और जाँघों पर फैल गई। वो चरम पर पहुँच गईं, सिसकियाँ लेती हुई।
मैंने बाहर नहीं निकाला। और दस-बारह धक्के मार कर अपना पूरा माल उनकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। गर्म वीर्य की धारें अंदर फूट रही थी। चाची की चूत से लंड निकालते ही सफेद मलाई जैसा माल बाहर निकलने लगा, उनकी जाँघों पर बह रहा था।
हम दोनों पसीने से भीगे, हाँफते हुए बिस्तर पर गिरे। मैंने चाची को अपनी छाती से चिपकाया। उनके मम्मे मेरे सीने में दबे हुए थे।
चाची: अनुज… शहर में भी तू मुझे ऐसे ही चोदता रहेगा ना? कोई रोके नहीं…
अनुज: रोकने वाला कोई नहीं चाची। अब ये शहर तेरी और मेरी चुदाई का अखाड़ा है। जब चाहे, जहाँ चाहे… तेरी चूत हमेशा मेरे लंड के लिए तैयार रहेगी।
रात भर हम ऐसे ही लिपटे रहे। सुबह चाचा-पापा आने से पहले हमने कपड़े पहन लिए, बिस्तर साफ किया। पर चाची की आँखों में वो चमक थी जो सिर्फ शहर की आज़ादी और मेरी चुदाई से आती है।
अब आगे क्या होता है, वो अगले पार्ट में…