पिछला भाग पढ़े:- पड़ोसी ने तोड़ी मेरी दीदी की सील-20
हिंदी सेक्स कहानी अब आगे-
सलीम से अपनी अच्छी खासी चुदाई करवाने के बाद मम्मी घर आयी, तब मैं और दीदी आंगन में बैठे थे। मम्मी की साड़ी उलझी हुए थी। बाल थोड़े बिखरे हुए थे। उनकी चाल भी बदल गई थी। मैंने देखा दीदी मम्मी को देख कर मन ही मन मुस्कुरा रही थी। मम्मी हम दोनों को देख कर मुस्कुराई पर मुझे ऐसा मेहसूस हुआ कि मम्मी हम दोनों से अपनी नज़रें चुरा रही थी।
मम्मी जब अपने बेडरूम में गई तब दीदी ने मुझे कहा: अमित, मम्मी को देख कर समझ रहा हैं?
मैं: क्या दीदी?
दीदी मेरे माथे पर टपली मारते हुए: तुम ना बिल्कुल बुद्धू हो। मम्मी आज अपनी चुदाई करवाके आई हैं। देख ना उनको ठीक से चला भी नहीं जा रहा। लगता हैं आज ठाकुर अंकल ने मम्मी को अच्छे से घोड़ी बनाया है। मम्मी भी आज कितनी ख़ुश लग रही है।
दीदी ऊपर वाले से: मेरी मम्मी को ऐसे ही ख़ुश रखना। पापा के चले जाने के बाद बिचारी कितनी दुखी रहती थी।
मैंने दीदी को देखता रह गया। अब दीदी को कैसे समझाऊं कि मम्मी की ख़ुशी का राज ठाकुर अंकल नहीं पर उसका बॉयफ्रेंड सलीम था। उस दिन मम्मी इतना थक गई थी उन्होंने बाहर खाने का ऑर्डर दिया। दीदी उस दिन बहुत खुश थी।
रात को मैं और दीदी अपने कमरे थे। दीदी सलीम से कॉल पर बाते कर रही थी। और उन्होंने हमेशा की तरह कॉल स्पीकर पर रखा था।
सलीम: क्या बात हैं जान, आज बहुत ख़ुश लग रही हो? क्या बात है?
दीदी: यार आज बहुत दिनों के बाद मम्मी के चेहरे पर ख़ुशी दिख रही हैं।
सलीम: अच्छा क्या हुआ?
दीदी शर्माते हुए: आज ना मम्मी ऑफिस से आई तब उसकी हालत देख कर ऐसा लग रहा था कि वो बहुत बढ़िया चुदवा के आई हे। तुम मेरी चुदाई करके जैसी हालत करते हो, ऐसा हाल आज मम्मी का था।
सलीम हकलाते हुए बोला: मतलब?
दीदी मुस्कुरा कर बोली: आज ना ठाकुर अंकल में मम्मी का हालत ख़राब कर दिया था। मम्मी इतना थक चुकी है कि बाहर से खाना मंगवा कर, खा कर सोने चली गई।
सलीम राहत की सांस लेकर बोला: अच्छा ऐसा हैं मेरी जान। सही हैं ना बेटी के साथ मां भी चुदाई का मजा लूट रही हैं।
दीदी मुस्कुरा कर: हां वो तो हैं।
मैं बहुत हैरान हो गया कि मम्मी और सलीम दोनों दीदी को मूर्ख बना रहे थे। मुझे तो बस एक बात का डर लगता था कि जिस दिन दीदी के सामने सच्चाई आयेगी तब वो पता नहीं क्या करेगी।
एक दिन की बात है। मैं और दीदी किसी काम से बाहर गए थे। रास्ता मम्मी के ऑफिस के पास से होकर ही जाता था।
दीदी ने मज़ाक में कहा: चलो, मम्मी की ऑफिस देख कर आते है। इतने दिनों से ऑफिस की बाते ही सुन रही हूं।
हम दोनों चलते हुए जा ही रहे थे कि मंजू ने अचानक मेरा हाथ दबाया, बोली: देख, देख सामने सलीम जी है ना वो?
मैंने भी देखा और बोला: हां, वहीं है।
सलीम एक-दम अपनी स्टाइल में, कार से थोड़ा दूर खड़ा मोबाइल देख रहा था। दीदी की आँखें चमक उठीं।
“मैं उनको सरप्राइज देती हूँ”, कह कर उसने तुरंत अपना फोन निकाला और कॉल किया। फोन बजा, फिर दूसरी बार, फिर तीसरी बार, पर सलीम ने फोन उठाया ही नहीं।
दीदी थोड़ा हैरान होते हुए बोली: अरे उठा क्यों नहीं रहे? देख रहे है फ़ोन फिर भी इग्नोर कर रहे है।
मैं भी थोड़ा चुप था। तभी दीदी ने फिर ध्यान से देखा और उसके चेहरे की मुस्कान एक पल में गायब हो गई। मम्मी ऑफिस की बिल्डिंग से बाहर आ रही थी, और सीधे जाकर सलीम के पास रुकी। फिर जो हुआ, वो दीदी को अंदर तक हिला गया। सलीम ने मम्मी को देखा, मुस्कराया और फिर एक-दम अपने पास खींच कर गले से लगा लिया।
दीदी की आँखें फटी की फटी रह गई। सलीम ने मम्मी के कंधे पर हाथ रखा, और फिर दोनों आराम से बात करते हुए कार की तरफ बढ़े। सलीम ने खुद कार का दरवाज़ा खोल कर मम्मी को बैठाया, और फिर ड्राइव करते हुए दोनों कहीं निकल गए। मैंने एक पल दीदी की तरफ देखा। उसका चेहरा सुन्न हो गया था। आँखें झुकी हुई, मुँह थोड़ा खुला, जैसे उसका दिल टूट गया हो।
दीदी ने धीरे से कहा: अब तो कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं बची, सब साफ़ हो गया। मम्मी और सलीम ने मिल कर मुझे धोखा दिया।
मैं कुछ नहीं बोल पाया। उसके चेहरे पर वो ताजगी नहीं थी जो सलीम का नाम सुनते ही आ जाती थी। आज वहाँ सिर्फ़ चोट थी। हम दोनों चुप-चाप वहाँ से निकल गए। दीदी ने एक भी शब्द नहीं कहा पूरे रास्ते। पर उसकी आँखें बहुत कुछ बोल रही थी।
शाम के करीब पाँच बजे थे। मैं और दीदी ड्रॉइंग रूम में बैठे थे, चाय पीते हुए बस चुपचाप बैठे थे। दिन भर जो देखा था, उसने दीदी को गुमसुम कर दिया था। तभी बाहर से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। मम्मी घर लौट आई थी। दीदी की नज़र तुरंत दरवाज़े की तरफ गई और फिर उसकी आँखें वहीं टिक गई।
मम्मी आज कुछ अलग ही लग रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। जैसे कोई बहुत अच्छा वक्त बिता कर लौटा हो। माथे पर हल्की बिखरी लटें, होंठों पर मंद-मंद मुस्कान, और आँखों में एक ठंडी सी शरारत।
वो पर्स कंधे से उतारते हुए सीधे कमरे के अंदर आई। मम्मी को देख कर लग रहा था आज सलीम नी उनकी खूब चुदाई की थी। उनकी चाल बदल गई थी। पैर लंगड़ा रहे थे। उसकी साड़ी भी ज़रा गड़बड़ सी थी। पल्लू थोड़ा कंधे से खिसका हुआ, कमर की प्लीट्स एक-दम करीने से नहीं जमी थी और गले पर एक छोटा सा निशान भी था, जिससे पता चल रहा था की सलीम ने मम्मी को बहुत चूसा और काटा होगा। वो निशान बड़ी कोशिश के बाद भी पूरी तरह छिपा नहीं था। मैंने देखा दीदी बस मम्मी को घूर रही थी।
मम्मी ने हमारी तरफ देखा, और वैसे ही हल्की सी हँसी के साथ बोली: अरे बेटा आज बाहर से खाना मंगवा लोगे? ऑफिस में आज बहुत काम था, थक गई मैं।
लेकिन उसकी उस थकान में थकावट कम, और सलीम के बड़े लंड से चुदने की संतुष्टि ज़्यादा दिख रही थी। दीदी ने कुछ नहीं कहा। बस एक गहरी नज़र उसके चेहरे पर डाली, फिर उसकी उंगलियाँ अपने कप के हैंडल पर कस गई। मुझे एहसास हुआ अब दीदी के लिए कोई शक बाकी नहीं था।
दीदी धीरे से मेरी ओर देखा, और बहुत धीमी आवाज़ में फुसफुसाई: अब तो कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं है। मम्मी के चेहरे पर सब साफ़ दिख रहा हे। साली रांड मेरे बॉयफ्रेंड से चुदवा कर आई हैं।
मैंने कुछ नहीं कहा बस दीदी की आँखों में देखता रहा। रात को हम ने बाहर से खाना मंगवा कर खा लिया। दीदी मम्मी को कुछ नहीं बोली। दीदी को बहुत गुस्सा आ रहा था, पर वो शांत थी।
मैं और दीदी अपने कमरे में थे। दीदी चुप-चाप बेड के एक कोने पर बैठी थी, कुछ सोच रही थी। मैं पास ही बैठा था, उसे देख रहा था उसके चेहरे पर परेशानी साफ़ दिख रही थी।
थोड़ी देर बाद दीदी बोली: अब समझ में आ रहा है।
मैंने पूछा: क्या?
दीदी एक-दम गुस्से में बोली: अब सब समझ में आ गया मुझे हर एक बात। मम्मी ने मुझे यूज़ किया, समझा? यूज़! ताकि उनके और सलीम के बीच जो चल रहा है, उस पर मैं कभी शक ना करूँ!
दीदी मेरे ऊपर गुस्सा करते बोली: और मैंने तुम्हें मम्मी पर नज़र रखने को बोला था ना। इतना सब कुछ दोनों के बीच चल रहा था। तुम्हें पता नहीं था?
मैं कुछ कहने ही वाला था, लेकिन उसने हाथ उठा कर रोक दिया और बोली: नहीं, आज सुनना पड़ेगा तुझे। मैं इतने टाइम से सोच रही थी कि मम्मी मुझसे दोस्ती कर रही हैं, मेरा भला चाहती हैं। लेकिन नहीं उन्हें सिर्फ अपने मज़े चाहिए थे! और वो सलीम? हरामख़ोर मुझसे मीठी बातें करता रहा और पीछे से मम्मी की बाहों में घुसा रहा!
उसकी आँखें भर आई, लेकिन गुस्से के आगे आँसू टिक नहीं पाए और रोते हुए बोली: जब-जब मम्मी मेरे से सलीम के बारे में बात करती थी, जब वो हँस के कहती थी कि अच्छा लड़का है। मैं पिघल जाती थी और सच्चाई ये थी कि वो सलीम सिर्फ मेरा नहीं था! वो दोनों खेल रहे थे मेरे साथ और मैं बनी रही उनकी प्यादी!
वो उठ कर कमरे में तेज़-तेज़ कदमों से चलने लगी। फिर दीवार पर मुक्का मारते हुए बोली: अब बहुत हो गया! अब नहीं झेलूँगी ये सब! अब उनको छुप कर खेलने नहीं दूँगी! अब मैं खुद अपनी आँखों से देखूँगी, उन्हें रंगे हाथ पकड़ूँगी! और इस बार ये बेटी-बेटी का नाटक नहीं चलेगा। साली रंडी को मेरी औक़ात दिखती हूं।
मैंने डरते हुए पूछा: क्या करेगी अब?
दीदी ने मेरी तरफ देखा उसकी आँखों में एक अलग ही आग थी और वो अपने हाथ मलते हुए बोली: अब मैं पीछा करूँगी। देखूँगी कहाँ जाती है, कब जाती है, और किसके पास जाती है। और जिस दिन सलीम के साथ दिख गई ना उस दिन या तो वो मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगी साली रंडी।
कमरे में सन्नाटा छा गया। और उसी सन्नाटे में मैंने महसूस किया। दीदी अब वही लड़की नहीं रही थी। उसका भरोसा टूटा था और अब वो किसी भी हद तक जाने को तैयार थी।
एक दिन मम्मी कुछ ज़्यादा तैयार होकर निकली। पहली नज़र में ही साफ लग रहा था कि आज का दिन ऑफिस का नहीं था। ये सीधी सलीम से मिलने के इरादे से जा रही है।
उसने पर्पल रंग की साड़ी पहनी थी। कपड़ा पतला और चिपकने वाला था। कोई कढ़ाई या डिज़ाइन नहीं था, लेकिन साड़ी का फिटिंग इतना टाइट था कि उसके बूब्स और हिप्स एक-दम साफ़ नजर आ रहे थे। ब्लाउज़ थोड़ा छोटा था, और आगे से काफी नीचा कटा हुआ। ब्रा की लाइन साफ दिख रही थी, और उसका पल्लू बस एक बहाना था। कंधे पर टिका था, मगर उसे ओढ़ने की कोशिश नहीं की गई थी।
बाल खुले थे, और थोड़े उलझे हुए भी लग रहे थे। मतलब ये कि स्टाइल बना तो रखा था, लेकिन जल्दी में किया गया। आँखों में काजल था, होंठों पर गहरे रंग की लिपस्टिक थी, और उसकी चाल में वो आत्मविश्वास था जो तब आता है जब किसी को पता हो कि सामने वाला पूरी तरह उसका दीवाना है।
मैं और दीदी दोनों वहीं आंगन में खड़े थे। हम दोनों ने उसे एक बार ऊपर से नीचे तक देखा। मम्मी दरवाज़े से निकली तो उसकी चाल एक-दम नॉर्मल थी, जैसे रोज़ की तरह ऑफिस जा रही हो। हमें देख कर हल्की सी मुस्कुराई, सिर थोड़ा झुकाया और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई। उसकी उस मुस्कान में ऐसी मासूमियत थी कि एक पल को हम दोनों को भी शक हुआ- शायद हम ही ज्यादा सोच रहे थे।
दीदी उस दिन वैसे ही थोड़ी चिड़चिड़ी लग रही थी, उसने सीधा कहा: भाई ये आज ऑफिस नहीं जाने वाली। साली रांड को देख कर पता चलता हैं सलीम से मिलने जा रही है। तूने उसकी चाल देखी? ये ऑफिस वाली चाल नहीं है। चल, पीछा करते हैं। कुछ गड़बड़ है।
मैं नहीं चाहता था दीदी और मम्मी का रिश्ता ख़राब हो तो मैं दीदी को समझाने लगा और बोला: शायद आप ज़्यादा सोच रही है। ऑफिस ही तो जा रही है।
दीदी: तुम ना उसकी साइड ना ले तो अच्छा है। तुमने उस दिन देखा था ना सलीम उनके ऑफिस के बाहर था और फिर दोनों उसकी कार में गए थे। चल छुप कर पीछा करते हैं।
हमने थोड़ी दूरी से मम्मी का पीछा शुरू किया। दीदी आगे-आगे, तेज़ क़दमों से, जैसे किसी का हिसाब लेने जा रही हो। मैं पीछे-पीछे, धीरे-धीरे ज्यादा बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। लेकिन जैसे ही मम्मी ने सलीम के गोडाउन के तरफ मुड़ कर चलना शुरू किया, उसका गुस्सा असली रूप में आ गया।
दीदी मेरी बांह पकड़ कर झटके से कहा: चल, देखते हैं ये रंडी मेरे बॉयफ्रेंड के साथ क्या कर रही है। आज अगर कुछ भी गड़बड़ दिखी ना, तो मैं इसका चेहरा नोच दूँगी।
मैं कुछ बोलने ही वाला था कि उसने फिर कहा: मत समझा मुझे, सब पता है मुझे। ये नई साड़ी, ये चाल, ये अदा सब सलीम के लिए है। मैं बेवकूफ नहीं हूँ।
मैंने बस धीरे से सिर हिलाया और चुप-चाप उसके साथ चलने लगा। मन में थोड़ी घबराहट थी। एक तरफ मंजू की आग जैसे मुझसे टकरा रही थी, दूसरी तरफ दिल में ये सोच कि अब जो दिखेगा, वो शायद अच्छा नहीं होगा।
थोड़ी देर बाद वो फिर भड़की और बोली: ये वो रांड है जो सबके सामने भोली बनती है, लेकिन पीठ पीछे सब जानती है कैसे फँसाना है मर्दों को। और सलीम भी, वो भी कोई दूध का धुला नहीं है। दोनों मिले हुए हैं। आज देखती हूँ कितनी देर लगती है इनके नाटक में।
मैं चुप-चाप उसकी बातों को सुनता रहा, ना हाँ कहा, ना ना। मैं कुछ बोला नहीं, क्यूंकी मुझे पता था आज मेरे घर में बहुत बड़ा झगड़ा होने वाला था। मेरी मां और बहन एक लड़के के लिए बहुत बुरी तरह लड़ने वाली थी।
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